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Rigveda / 5 / 35 / 6

त्वामिद्वृ॑त्रहन्तम॒ जना॑सो वृ॒क्तब॑र्हिषः। उ॒ग्रं पू॒र्वीषु॑ पू॒र्व्यं हव॑न्ते॒ वाज॑सातये ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 35 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : प्रभूवसुराङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : स्वराडुष्निक् | स्वर : ऋषभः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : त्वाम्। इत्। वृ॒त्र॒ह॒न्ऽत॒म॒। जना॑सः। वृ॒क्तऽबर्हिषः। उ॒ग्रम्। पू॒र्वीषु॑। पू॒र्व्यम्। हव॑न्ते। वाज॑ऽसातये ॥६॥

पदार्थ : हे (वृत्रहन्तम) अतिशय करके धन को प्राप्त होनेवाले राजन् ! (वृक्तबर्हिषः) विदीर्ण किया है हवन किये हुए पदार्थों से अन्तरिक्ष को जिन्होंने ऐसे ऋत्विक् (जनासः) प्रसिद्ध पुण्यात्मा जन (वाजसातये) संग्राम वा अन्न आदि के विभाग के लिये (उग्रम्) दुष्टों में कठिन स्वभाववाले और (पूर्वीषु) प्राचीन प्रजाओं में (पूर्व्यम्) पूर्व राजाओं से किया गया सत्कार जिनका ऐसे (त्वाम्) आपकी (हवन्ते) स्तुति करते वा ग्रहण करते हैं, वह आप उनकी सर्वदा (इत्) ही उत्तम प्रकार रक्षा कीजिये ॥६॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जो प्रतिष्ठित क्षत्रियों के कुल में उत्पन्न हुआ, विद्या और विनय आदि से युक्त और प्रजा के पालन में तत्पर इच्छा जिसकी ऐसा होवे, उसको राजा मानो ॥६॥