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Rigveda / 5 / 39 / 3

यत्ते॑ दि॒त्सु प्र॒राध्यं॒ मनो॒ अस्ति॑ श्रु॒तं बृ॒हत्। तेन॑ दृ॒ळ्हा चि॑दद्रिव॒ आ वाजं॑ दर्षि सा॒तये॑ ॥३॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 39 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : अत्रिः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराडनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : यत्। ते॒। दि॒त्सु। प्र॒ऽराध्य॑म्। मनः॑। अस्ति॑। श्रु॒तम्। बृ॒हत्। तेन॑। दृ॒ळ्हा। चि॒त्। अ॒द्रि॒ऽवः॒। आ। वाज॑म्। द॒र्षि॒। सा॒तये॑ ॥३॥

पदार्थ : हे (अद्रिवः) उत्तम प्रकार शोभित पर्वत से युक्त विद्वन् ! (ते) आपके (यत्) जो (दित्सु) देने की इच्छा करनेवाला (प्रराध्यम्) अत्यन्त साधने योग्य (श्रुतम्) श्रवण और (बृहत्) बड़ा (मनः) चित्त (अस्ति) है (तेन) इससे (चित्) भी आप (दृळ्हा) दृढ़ वस्तुओं की रक्षा करते हो और (सातये) धर्म और अधर्म के [विभाग के] लिये (वाजम्) संग्राम का (आ, दर्षि) भङ्ग करते हो ॥३॥

भावार्थ : जिससे मनुष्य ब्रह्मचर्य्य, विद्या, योगाभ्यास और सत्यभाषण आदि के आचरण से सम्पूर्ण विद्याओं से युक्त मन को सिद्ध कर धर्म से सम्पूर्ण जनों के हित के लिये दुष्टों को दण्ड देता है, इससे वह अति उत्तम है ॥३॥