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Rigveda / 5 / 39 / 4

मंहि॑ष्ठं वो म॒घोनां॒ राजा॑नं चर्षणी॒नाम्। इन्द्र॒मुप॒ प्रश॑स्तये पू॒र्वीभि॑र्जुजुषे॒ गिरः॑ ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 39 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : अत्रिः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृदनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : अब राजप्रजाविषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : मंहि॑ष्ठम्। वः॒। म॒घोना॑म्। राजा॑नम्। च॒र्ष॒णी॒नाम्। इन्द्र॑म्। उप॑। प्रऽश॑स्तये। पू॒र्वीभिः॑। जु॒जु॒षे॒। गिरः॑ ॥४॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जिस (वः) आप लोगों और (मघोनाम्) बहुत ऐश्वर्य्यों से युक्त (चर्षणीनाम्) मनुष्यों के (मंहिष्ठम्) अत्यन्त बड़े और (इन्द्रम्) अत्यन्त ऐश्वर्य्य के देनेवाले (राजानम्) राजा को (प्रशस्तये) प्रशंसा के लिये (पूर्वीभिः) प्राचीन प्रजाओं के साथ (गिरः) वाणियों को (उप, जुजुषे) समीप से सेवते वा प्रसन्नता करते हो, वे और वह सर्वत्र सुखी होते हैं ॥४॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जो राजा और जो प्रजाजन परस्पर अनुकूलता अर्थात् प्रीतिपूर्वक वर्त्ताव रखते, वे सदा आनन्दित होते हैं ॥४॥