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Rigveda / 5 / 41 / 17

इति॑ चि॒न्नु प्र॒जायै॑ पशु॒मत्यै॒ देवा॑सो॒ वन॑ते॒ मर्त्यो॑ व॒ आदे॑वासो वनते॒ मर्त्यो॑ वः। अत्रा॑ शि॒वां त॒न्वो॑ धा॒सिम॒स्या ज॒रां चि॑न्मे॒ निर्ऋ॑तिर्जग्रसीत ॥१७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 41 | Mantra No : 17

In Hindi:

ऋषि : अत्रिः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर विद्वद्विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : इति॑। चि॒त्। नु। प्र॒ऽजायै॑। प॒शु॒ऽमत्यै॑। देवा॑सः। वन॑ते। मर्त्यः॑। वः॒। आ। दे॒वा॒सः॒। व॒न॒ते॒। मर्त्यः॑। वः॒। अत्र॑। शि॒वाम्। त॒न्वः॑। धा॒सिम्। अ॒स्याः। ज॒राम्। चि॒त्। मे॒। निःऽऋ॑तिः। ज॒ग्र॒सी॒त॒ ॥१७॥

पदार्थ : हे (देवासः) विद्वान् जनो ! जो (मर्त्यः) मनुष्य (वः) आप लोगों को (पशुमत्यै) बहुत पशु विद्यमान जिसमें उस (प्रजायै) प्रजा के लिये (धासिम्) अन्न की (वनते) सेवा करता है और जो (चित्) निश्चय से (इति) इस प्रकार से (अस्याः) इस प्रजा के (तन्वः) शरीर की (शिवाम्) मङ्गलस्वरूप (जराम्) वृद्धावस्था की (आ, वनते) अच्छे प्रकार सेवा करता है और जो (मर्त्यः) मनुष्य (चित्) निश्चय से (मे) मेरे शरीर की मङ्गलस्वरूप वृद्धावस्था का सेवन करता है और (निर्ऋतिः) भूमि के सदृश (अत्रा) इस प्रजा में (वः) आप लोगों के अन्न को (जग्रसीत) खाता है, इस प्रकार हे (देवासः) विद्वान् ! आप लोग हम लोगों के लिये इसको (नु) शीघ्र सिद्ध कीजिये ॥१७॥

भावार्थ : हे विद्वान् जनो ! आप लोग ऐसा प्रयत्न करो जिससे मनुष्यों की अवस्था बढ़े, जब तक मनुष्य वृद्ध नहीं होते, तब तक ये परीक्षक भी नहीं होते हैं ॥१७॥