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Rigveda / 5 / 41 / 18

तां वो॑ देवाः सुम॒तिमू॒र्जय॑न्ती॒मिष॑मश्याम वसवः॒ शसा॒ गोः। सा नः॑ सु॒दानु॑र्मृ॒ळय॑न्ती दे॒वी प्रति॒ द्रव॑न्ती सुवि॒ताय॑ गम्याः ॥१८॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 41 | Mantra No : 18

In Hindi:

ऋषि : अत्रिः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : ताम्। वः॒। दे॒वाः॒। सु॒ऽम॒तिम्। ऊ॒र्जय॑न्तीम्। इष॑म्। अ॒श्या॒म॒। व॒स॒वः॒। शसा॑। गोः। सा। नः॒। सु॒ऽदानुः॑। मृ॒ळय॑न्ती। दे॒वी। प्रति॑। द्रव॑न्ती। सु॒वि॒ताय॑। ग॒म्याः॒ ॥१८॥

पदार्थ : हे (देवाः) धार्मिक विद्वान् जनो ! जो (सुदानुः) उत्तम दान से युक्त (मृळयन्ती) सुख देती ([प्रति] द्रवन्ती) जानती वा चलती हुई (देवी) विद्यायुक्त स्त्री (सुविताय) ऐश्वर्य्य के लिये (वः) आप लोगों को प्राप्त होती है (ताम्) उसको (ऊर्जयन्तीम्) तथा पराक्रम आदि के दान से वृद्धि कराती हुई (सुमतिम्) श्रेष्ठ बुद्धि को और (इषम्) अन्न को हम लोग (अश्याम) भोगें। हे (वसवः) उत्तम गुणों में निवास किये हुए जनो ! जो (गोः) पृथिवी के मध्य में (शसा) प्रशंसा के साथ वर्त्तमान है (सा) वह (नः) हम लोगों को प्राप्त हो। और हे विद्यायुक्त स्त्री ! आप इन जनों के (प्रति) प्रति (गम्याः) प्राप्त हूजिये ॥१८॥

भावार्थ : मनुष्य सदा उत्तम प्रकार घृत आदि के संस्कार से युक्त बुद्धि और बल के बढानेवाले अन्न का सदा भोग करें, जिससे बुद्धि यश और धन बढ़े ॥१८॥