Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 5 / 53 / 4

ये अ॒ञ्जिषु॒ ये वाशी॑षु॒ स्वभा॑नवः स्र॒क्षु रु॒क्मेषु॑ खा॒दिषु॑। श्रा॒या रथे॑षु॒ धन्व॑सु ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 53 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : श्यावाश्व आत्रेयः | देवता : मरुतः | छन्द : निचृद्बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : मनुष्य पुरुषार्थ से किस किसको प्राप्त होवें, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : ये। अ॒ञ्जिषु॑। ये। वाशी॑षु। स्वऽभा॑नवः। स्र॒क्षु। रु॒क्मेषु॑। खा॒दिषु॑। श्रा॒याः। रथे॑षु। धन्व॑ऽसु ॥४॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (ये) जो (वाशीषु) वाणियों में (स्वभानवः) अपने प्रकाश जिनके वे (अञ्जिषु) प्रकट व्यवहारों में (स्रक्षु) माला के मणियों में और (रुक्मेषु) सुवर्ण आदिकों में वा (ये) जो (खादिषु) भक्षण आदिकों में (रथेषु) वाहनों में और (धन्वसु) स्थलों में (श्रायाः) सुनते वा सुनाते हैं, वे प्रसिद्ध होते हैं ॥४॥

भावार्थ : जो मनुष्य पुरुषार्थी होवें, वे सब प्रकार से सत्कार को प्राप्त हुए लक्ष्मीवान् होते हैं ॥४॥