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Rigveda / 5 / 53 / 5

यु॒ष्माकं॑ स्मा॒ रथाँ॒ अनु॑ मु॒दे द॑धे मरुतो जीरदानवः। वृ॒ष्टी द्यावो॑ य॒तीरि॑व ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 53 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : श्यावाश्व आत्रेयः | देवता : मरुतः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : यु॒ष्माक॑म्। स्म॒। रथा॑न्। अनु॑। मु॒दे। द॒धे॒। म॒रु॒तः॒। जी॒र॒ऽदा॒न॒वः॒। वृ॒ष्टी। द्यावः॑। य॒तीःऽइ॑व ॥५॥

पदार्थ : हे (जीरदानवः) जीवते हुए (मरुतः) मनुष्यो ! मैं (युष्माकम्) आप लागों के (मुदे) आनन्द के लिये (रथान्) विमान आदि यानों को (दधे) धारण करता हूँ और (वृष्टी) वर्षाओं तथा (द्यावः) प्रकाशों को (यतीरिव) प्रयत्न से सिद्ध होनेवाली क्रियाओं के समान (स्मा) ही (अनु) पीछे आनन्द के लिये धारण करता हूँ ॥५॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जैसे मैं अभ्यास से विद्या के प्रकाशों को यज्ञ से वृष्टि को धारण करता हूँ, वैसे आप लोग भी इनको धारण कीजिये ॥५॥