Rigveda / 5 / 82 / 5
विश्वा॑नि देव सवितर्दुरि॒तानि॒ परा॑ सुव। यद्भ॒द्रं तन्न॒ आ सु॑व ॥५॥
Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 82 | Mantra No : 5
In English:
Seer : shyaavaashva aatreyaH | Devta : savitaa | Metre : gaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : vishvaani deva savitarduritaani paraa suva. yadbhadra.m tanna aa suva .5.
Component Words : vishvaani. deva. savitaH. duH.aitaani. paraa. suva. yat. bhadram. tat. naH. aa. suva .5.
In Hindi:
ऋषि : श्यावाश्व आत्रेयः | देवता : सविता | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : मनुष्य किसलिये ईश्वर की प्रार्थना करें, इस विषय को कहते हैं ॥
पदपाठ : विश्वा॑नि। दे॒व॒। स॒वि॒तः॒। दुः॒ऽइ॒तानि॑। परा॑। सु॒व॒। यत्। भ॒द्रम्। तत्। नः॒। आ। सु॒व॒ ॥५॥
पदार्थ : हे (सवितः) संपूर्ण संसार के उत्पन्न करनेवाले (देव) और संपूर्ण संसार को प्रकाशित करनेवाले जगदीश्वर ! (विश्वानि) संपूर्ण (दुरितानि) दुष्ट आचरणों को आप (परा, सुव) दूर कीजिये और (यत्) जो (भद्रम्) कल्याणकारक है (तत्) उसको (नः) हम लोगों के लिये (आ, सुव) सब प्रकार से प्राप्त कीजिये ॥५॥
भावार्थ : हे परमेश्वर ! आप कृपा से जितने हम लोगों में दुष्ट आचरण हैं, उनको अलग करके धर्म्मयुक्त गुण, कर्म्म और स्वभावों को स्थापित कीजिये ॥५॥
In Sanskrit:
ऋषि : श्यावाश्व आत्रेयः | देवता : सविता | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : मनुष्यैः किमर्थमीश्वरः प्रार्थनीय इत्याह ॥
पदपाठ : विश्वा॑नि। दे॒व॒। स॒वि॒तः॒। दुः॒ऽइ॒तानि॑। परा॑। सु॒व॒। यत्। भ॒द्रम्। तत्। नः॒। आ। सु॒व॒ ॥५॥
पदार्थ : (विश्वानि) सर्वाणि (देव) सकलजगत्प्रकाशक (सवितः) सर्वविश्वोत्पादक (दुरितानि) दुष्टाचरणानि (परा) (सुव) दूरे प्रक्षिप (यत्) (भद्रम्) कल्याणकरम् (तत्) (नः) अस्मभ्यम् (आ) (सुव) समन्तात् प्रापय ॥५॥
अन्वय : हे सवितर्देव जगदीश्वर ! विश्वानि दुरितानि त्वं परा सुव यद्भद्रं तन्न आ सुव ॥५॥
भावार्थ : हे परमेश्वर ! भवान् कृपया यावन्त्यस्मासु दुष्टाचरणानि सन्ति तावन्ति पृथक्कृत्य धर्म्यगुणकर्मस्वभावान् स्थापयतु ॥५॥