Rigveda / 5 / 82 / 6
अना॑गसो॒ अदि॑तये दे॒वस्य॑ सवि॒तुः स॒वे। विश्वा॑ वा॒मानि॑ धीमहि ॥६॥
Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 82 | Mantra No : 6
In English:
Seer : shyaavaashva aatreyaH | Devta : savitaa | Metre : nichRRidgaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : anaagaso aditaye devasya savituH save. vishvaa vaamaani dhiimahi .6.
Component Words : anaagasaH. aditaye. devasya. savituH. save. vishvaa. vaamaani. dhiimahi .6.
In Hindi:
ऋषि : श्यावाश्व आत्रेयः | देवता : सविता | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : इस जगत् में मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥
पदपाठ : अना॑गसः। अदि॑तये। दे॒वस्य॑। स॒वि॒तुः॒। स॒वे। विश्वा॑। वा॒मानि॑। धी॒म॒हि॒ ॥६॥
पदार्थ : हे मनुष्यो ! जैसे (अनागसः) अपराध से रहित हम लोग (अदितये) माता आदि के लिये (देवस्य) सर्व सुख देनेवाले (सवितुः) सम्पूर्ण ऐश्वर्य से युक्त परमात्मा के (सवे) जगद्रूप ऐश्वर्य्य में (विश्वा) सम्पूर्ण (वामानि) संभोग करने योग्य धनों को (धीमहि) धारण करें, वैसे आप लोग भी धारण करो ॥६॥
भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । जैसे विद्वान् जन इस ईश्वर से रचे हुए संसार में सृष्टिक्रम से विद्या के द्वारा कार्य्यों को सिद्ध करते हैं, वैसे ही अन्य जनों को भी चाहिये कि सिद्ध करें ॥६॥
In Sanskrit:
ऋषि : श्यावाश्व आत्रेयः | देवता : सविता | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : अस्मिन् जगति मनुष्यैः किं कर्त्तव्यमित्याह ॥
पदपाठ : अना॑गसः। अदि॑तये। दे॒वस्य॑। स॒वि॒तुः॒। स॒वे। विश्वा॑। वा॒मानि॑। धी॒म॒हि॒ ॥६॥
पदार्थ : (अनागसः) अनपराधाः (अदितये) मात्राद्याय (देवस्य) सर्वसुखदातुः (सवितुः) सकलैश्वर्य्यसम्पन्नस्य (सवे) जगद्रूपैश्वर्य्ये (विश्वा) सर्वाणि (वामानि) वननीयानि सम्भजनीयानि धनानि (धीमहि) धरेम ॥६॥
अन्वय : हे मनुष्या ! यथाऽनागसो वयमदितये देवस्य सवितुः सवे विश्वा वामानि धीमहि तथा यूयमपि धरत ॥६॥
भावार्थ : अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः । यथा विद्वांसोऽस्मिन्नीश्वररचिते जगति सृष्टिक्रमेण विद्यया कार्य्याणि साध्नुवन्ति तथैवान्यैरपि साधनीयानि ॥६॥