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Rigveda / 5 / 83 / 7

अ॒भि क्र॑न्द स्त॒नय॒ गर्भ॒मा धा॑ उद॒न्वता॒ परि॑ दीया॒ रथे॑न। दृतिं॒ सु क॑र्ष॒ विषि॑तं॒ न्य॑ञ्चं स॒मा भ॑वन्तू॒द्वतो॑ निपा॒दाः ॥७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 83 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : अत्रिः | देवता : पृथिवी | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर वह मेघ क्या करता है, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : अ॒भि। क्र॒न्द॒। स्त॒नय॑। गर्भ॑म्। आ। धाः॒। उ॒द॒न्ऽवता॑। परि॑। दी॒य॒। रथे॑न। दृति॑म्। सु। क॒र्ष॒। विऽसि॑तम्। न्य॑ञ्चम्। स॒माः। भ॒व॒न्तु॒। उ॒त्ऽवतः॑। नि॒ऽपा॒दाः ॥७॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जो मेघ (गर्भम्) गर्भ को (आ, धाः) चारों ओर से धारण करता और (उदन्वता) बहुत जल के सहित (रथेन) सुन्दर स्वरूप से (अभि) सम्मुख (क्रन्द) शब्द करता और (स्तनय) गर्जता है (दृतिम्) फाड़नेवाले के सदृश जल से पूर्ण को (सु, कर्ष) विशेष करके खोदता और दुःखों का (परि) सब प्रकार से (दीया) नाश करता और (विषितम्) बंधे (न्यञ्चम्) निश्चित सेवा करते हुए को विशेष करके लिखता अर्थात् चेष्टा में लाता है तथा जिससे हम लोगों के (उद्वतः) ऊर्ध्वस्थान में वर्त्तमान (निपादाः) निश्चित वा नाचे हैं अंश जिनके ऐसे (समाः) वर्ष (भवन्तु) होवें, उसको जानिये ॥७॥

भावार्थ : जो निश्चय[पूर्वक] जल से संसार को पुष्ट करता है और दुःख का नाश करता तथा फलों को उत्पन्न करता है, वह मेघ विश्वंभर है, ऐसा जानना चाहिये ॥७॥