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Rigveda / 5 / 83 / 8

म॒हान्तं॒ कोश॒मुद॑चा॒ नि षि॑ञ्च॒ स्यन्द॑न्तां कु॒ल्या विषि॑ताः पु॒रस्ता॑त्। घृ॒तेन॒ द्यावा॑पृथि॒वी व्यु॑न्धि सुप्रपा॒णं भ॑वत्व॒घ्न्याभ्यः॑ ॥८॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 83 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : अत्रिः | देवता : पृथिवी | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब मेघनिमित्त कौन हैं, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : म॒हान्त॑म्। कोश॑म्। उत्। अ॒च॒। नि। सि॒ञ्च॒। स्यन्द॑न्ताम्। कु॒ल्याः। विऽसि॑ताः। पु॒रस्ता॑त्। घृ॒तेन॑। द्यावा॑पृथि॒वी इति॑। वि। उ॒न्धि॒। सु॒ऽप्र॒पा॒नम्। भ॒व॒तु॒। अ॒घ्न्याभ्यः॑ ॥८॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जो सूर्य्य (महान्तम्) बड़े परिमाणवाले (कोशम्) घनादिकों के कोश के समान जल से परिपूर्ण मेघ को (उत्) (अचा) ऊपर प्राप्त होता है और जिससे पृथिवी को (नि, सिञ्च) निरन्तर सींचता है और (पुरस्तात्) प्रथम (विषिताः) व्याप्त (कुल्याः) रचे गये जल के निकलने के मार्ग (स्यन्दन्ताम्) बहें और जो (घृतेन) जल से (द्यावापृथिवी) पृथिवी और अन्तरिक्ष को (वि, उन्धि) अच्छे प्रकार गीला करता है वह (अघ्न्याभ्यः) गौओं के लिये (सुप्रपाणम्) उत्तम प्रकार प्रकर्षता से पीते हैं जिसमें ऐसा जलाशय (भवतु) हो, यह जानो ॥८॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जो बिजुली, सूर्य्य और वायु मेघ के कारण हैं, उनको यथायोग्य प्रयुक्त कीजिये जिससे वृष्टि द्वारा गौ आदि पशुओं का यथावत् पालन होवे ॥८॥