Rigveda / 5 / 83 / 9
यत्प॑र्जन्य॒ कनि॑क्रदत्स्त॒नय॒न् हंसि॑ दु॒ष्कृतः॑। प्रती॒दं विश्वं॑ मोदते॒ यत्किं च॑ पृथि॒व्यामधि॑ ॥९॥
Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 83 | Mantra No : 9
In English:
Seer : atriH | Devta : pRRithivii | Metre : viraaTtriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation Under Process
Verse : yatparjanya kanikradatstanayan ha.msi duShkRRitaH. pratiida.m vishva.m modate yatki.m cha pRRithivyaamadhi .9.
Component Words : yat. parjanya. kanikradat. stanayan. ha.msi. duH.akRRitaH. prati. idam. vishvam. modate. yat. kim. cha. pRRithivyaam. adhi .9.
In Hindi:
ऋषि : अत्रिः | देवता : पृथिवी | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥
पदपाठ : यत्। प॒र्ज॒न्य॒। कनि॑क्रदत्। स्त॒नय॑न्। हंसि॑। दुः॒ऽकृतः॑। प्रति॑। इ॒दम्। विश्व॑म्। मो॒द॒ते॒। यत्। किम्। च॒। पृ॒थि॒व्याम्। अधि॑ ॥९॥
पदार्थ : हे मनुष्यो ! (यत्) जो (पर्जन्य) मेघ (कनिक्रदत्) अत्यन्त शब्द करता तथा (स्तनयन्) गर्जन करता हुआ (दुष्कृतः) दुःख से करनेवालों का (हंसि) नाश करता है (यत्) जो (किम्) कुछ (च) भी (इदम्) यह वर्त्तमान (पृथिव्याम्) पृथिवी (अधि) पर (विश्वम्) सम्पूर्ण जगत् वर्त्तमान है वह जिस मेघ से (प्रति, मोदते) आनन्दित होता है, वह बड़ा उपकारी है ॥९॥
भावार्थ : मेघ से ही सम्पूर्ण प्राणी आनन्दित होते हैं, इससे यह मेघ को बनानारूप कर्म्म परमेश्वर का धन्यवाद के योग्य है, यह सब लोग जानो ॥९॥
In Sanskrit:
ऋषि : अत्रिः | देवता : पृथिवी | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह ॥
पदपाठ : यत्। प॒र्ज॒न्य॒। कनि॑क्रदत्। स्त॒नय॑न्। हंसि॑। दुः॒ऽकृतः॑। प्रति॑। इ॒दम्। विश्व॑म्। मो॒द॒ते॒। यत्। किम्। च॒। पृ॒थि॒व्याम्। अधि॑ ॥९॥
पदार्थ : (यत्) यः (पर्जन्य) पर्जन्यो मेघः (कनिक्रदत्) भृशं शब्दयन् (स्तनयन्) गर्जनं कुर्वन् (हंसि) अत्र पुरुषव्यत्ययः। (दुष्कृतः) ये दुःखेन कुर्वन्ति तान् (प्रति) (इदम्) वर्त्तमानम् (विश्वम्) सर्वं जगत् (मोदते) (यत्) (किम्) (च) (पृथिव्याम्) (अधि) उपरि ॥९॥
अन्वय : हे मनुष्या ! यद्यः पर्जन्य कनिक्रदत् स्तनयन् दुष्कृतो हंसि यत्किं चेदं पृथिव्यामधि विश्वं वर्त्तते तत्सर्वं येन मेघेन प्रति मोदते स महानुपकार्यस्ति ॥९॥
भावार्थ : मेघेनैव सर्वाणि भूतान्यानन्दन्ति तस्मादिदं मेघनिर्माणाख्यं कर्म परमेश्वरस्य धन्यवादार्हमस्तीति सर्वे विजानन्तु ॥९॥