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Rigveda / 5 / 85 / 4

उ॒नत्ति॒ भूमिं॑ पृथि॒वीमु॒त द्यां य॒दा दु॒ग्धं वरु॑णो॒ वष्ट्यादित्। सम॒भ्रेण॑ वसत॒ पर्व॑तासस्तविषी॒यन्तः॑ श्रथयन्त वी॒राः ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 85 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : अत्रिः | देवता : वरुणः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब राजाजन कैसा वर्त्ताव करें, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : उ॒नत्ति॑। भूमि॑म्। पृ॒थिवीम्। उ॒त। द्याम्। य॒दा। दु॒ग्धम्। वरु॑णः। वष्टि॑। आत्। इत्। सम्। अ॒भ्रेण॑। व॒स॒त॒। पर्व॑तासः। त॒वि॒षी॒ऽयन्तः॑। श्र॒थ॒य॒न्त॒। वी॒राः ॥४॥

पदार्थ : हे राजन् ! (यदा) जब (वरुणः) वायु के सदृश राजा (अभ्रेण) मेघ से (पृथिवीम्) विस्तीर्ण (भूमिम्) भूमि को और (उत) भी (द्याम्) प्रकाश को (सम्, उनत्ति) गीला करता है (आत्) उसके अनन्तर (इत्) ही वायु के सदृश राजा (दुग्धम्) दुग्ध की (वृष्टि) कामना करता है और हे (तविषीयन्तः) सेना की कामना करते हुए (वीराः) शूरवीरो ! आप लोग (पर्वतासः) मेघों के सदृश यहाँ (वसत) वास करिये और (श्रथयन्त) अर्थात् शत्रुओं का नाश करिये ॥४॥

भावार्थ : वे ही राजा श्रेष्ठ हैं, जो प्रजा के हित की कामना करते हैं और जैसे मेघ सब के सुखों की वृष्टि करते हैं, वैसे ही राजा लोग प्रजाओं की कामनाओं को पूर्ण करें ॥४॥