Rigveda / 5 / 85 / 5
इ॒मामू॒ ष्वा॑सु॒रस्य॑ श्रु॒तस्य॑ म॒हीं मा॒यां वरु॑णस्य॒ प्र वो॑चम्। माने॑नेव तस्थि॒वाँ अ॒न्तरि॑क्षे॒ वि यो म॒मे पृ॑थि॒वीं सूर्ये॑ण ॥५॥
Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 85 | Mantra No : 5
In English:
Seer : atriH | Devta : varuNaH | Metre : nichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation Under Process
Verse : imaamuu Shvaasurasya shrutasya mahii.m maayaa.m varuNasya pra vocham. maaneneva tasthivaa.N antarikShe vi yo mame pRRithivii.m suuryeNa .5.
Component Words : imaam. uu.N iti. su. aasurasya. shrutasya. mahiim. maayaam. varuNasya. pra. vocham. maanena.aiva. tasthi.avaan. antarikShe. vi. yaH. mame. pRRithiviim. suuryeNa .5.
In Hindi:
ऋषि : अत्रिः | देवता : वरुणः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : अब विद्वान् और ईश्वर क्या करते हैं, इस विषय को कहते हैं ॥
पदपाठ : इ॒माम्। ऊँ॒ इति॑। सु। आ॒सु॒रस्य॑। श्रु॒तस्य॑। म॒हीम्। मा॒याम्। वरु॑णस्य। प्र। वो॒च॒म्। माने॑नऽइव। त॒स्थि॒ऽवान्। अ॒न्तरि॑क्षे। वि। यः। म॒मे। पृ॒थि॒वीम्। सूर्ये॑ण ॥५॥
पदार्थ : हे मनुष्यो ! जैसे मैं (इमाम्) इस (श्रुतस्य) सुने गये (आसुरस्य) मेघ में उत्पन्न हुए और (वरुणस्य) श्रेष्ठ की (महीम्) आदर करने योग्य वाणी और (मायाम्) बुद्धि का आप लोगों के लिये (सु, प्र, वोचम्) उत्तम प्रकार उपदेश करूँ (उ) और (यः) जो (तस्थिवान्) ठहरनेवाला (मानेनेव) सत्कार से जैसे वैसे (अन्तरिक्षे) आकाश में (सूर्य्येण) सूर्य्य के साथ (पृथिवीम्) पृथिवी को (वि,ममे) विस्तारता है, उसको ईश्वर जानो ॥५॥
भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! जो मेघ की विद्या के जाननेवाले की वाणी और बुद्धि की प्रशंसा करता है और जो परमेश्वर सम्पूर्ण जगत् को रचता है, उन दोनों का सदा सत्कार करो ॥५॥
In Sanskrit:
ऋषि : अत्रिः | देवता : वरुणः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : अथ विद्वदीश्वरौ किं कुरुत इत्याह ॥
पदपाठ : इ॒माम्। ऊँ॒ इति॑। सु। आ॒सु॒रस्य॑। श्रु॒तस्य॑। म॒हीम्। मा॒याम्। वरु॑णस्य। प्र। वो॒च॒म्। माने॑नऽइव। त॒स्थि॒ऽवान्। अ॒न्तरि॑क्षे। वि। यः। म॒मे। पृ॒थि॒वीम्। सूर्ये॑ण ॥५॥
पदार्थ : (इमाम्) (उ) (सु) (आसुरस्य) मेघभवस्य (श्रुतस्य) (महीम्) पूज्यां वाणीम्। महीति वाङ्नामसु पठितम्। (निघं०१.११) (मायाम्) प्रज्ञाम् (वरुणस्य) श्रेष्ठस्य (प्र) (वोचम्) उपदिशेयम् (मानेनेव) सत्कारेणेव (तस्थिवान्) यस्तिष्ठति (अन्तरिक्षे) आकाशे (वि) (यः) (ममे) सृजति (पृथिवीम्) (सूर्य्येण) सवित्रा सह ॥५॥
अन्वय : हे मनुष्या ! यथाहमिमां श्रुतस्याऽऽसुरस्य वरुणस्य महीं मायां युष्मदर्थं सु प्र वोचमु यस्तस्थिवान् मानेनेवान्तरिक्षे सूर्य्येण सह पृथिवीं वि ममे तमीश्वरं वि जानीत ॥५॥
भावार्थ : अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः । हे मनुष्या ! यो मेघविद्याविदो वाणीं प्रज्ञां च प्रशंसति यश्च परमेश्वरो सर्वं जगद्रचयति तौ सदा सत्कुरुत ॥५॥