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Rigveda / 5 / 86 / 4

ता वा॒मेषे॒ रथा॑नामिन्द्रा॒ग्नी ह॑वामहे। पती॑ तु॒रस्य॒ राध॑सो वि॒द्वांसा॒ गिर्व॑णस्तमा ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 86 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : अत्रिः | देवता : इन्द्राग्नी | छन्द : विराडनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : ता। वा॒म्। एषे॑। रथा॑नाम्। इ॒न्द्रा॒ग्नी इति॑। ह॒वा॒म॒हे॒। पती॒ इति॑। तु॒रस्य॑। राध॑सः। वि॒द्वांसा॑। गिर्व॑णःऽतमा ॥४॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जो (रथानाम्) वाहनों और (तुरस्य) शीघ्र सुखकारक (राधसः) धन के (पती) पालन करनेवाले (गिर्वणस्तमा) अतिशय उत्तम प्रकार शिक्षित वाणी का सेवन करते हुए (विद्वांसा) विद्या से युक्त (इन्द्राग्नी) वायु और बिजुली (वाम्) और आप दोनों को (एषे) प्राप्त होने के लिये हम लोग (हवामहे) प्राप्त होने की इच्छा करें (ता) उन दोनों को आप लोग भी प्राप्त होओ ॥४॥

भावार्थ : मनुष्यों को चाहिये कि वायु और बिजुली के सदृश श्रेष्ठ गुणों से व्याप्त विद्वानों के सङ्ग से विद्या और शिक्षा को प्राप्त होकर प्रजाओं में मित्र के सदृश वर्त्ताव करें ॥४॥