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Rigveda / 5 / 86 / 5

ता वृ॒धन्ता॒वनु॒ द्यून्मर्ता॑य दे॒वाव॒दभा॑। अर्ह॑न्ता चित्पु॒रो द॒धेंऽशे॑व दे॒वावर्व॑ते ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 86 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : अत्रिः | देवता : इन्द्राग्नी | छन्द : विराडनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : ता। वृ॒धन्तौ॑। अनु॑। द्यून्। मर्ता॑य। दे॒वौ। अ॒दभा॑। अर्ह॑न्ता। चि॒त्। पु॒रः। द॒धे॒। अंशा॑ऽइव। दे॒वौ। अर्व॑ते ॥५॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जो (अंशेव) भाग के सदृश सत्कार करने योग्य (मर्त्ताय) मनुष्य के लिये (अनु, द्यून्) प्रतिदिन (वृधन्तौ) बढ़ते वा बढ़ाते हुए (अदभा) नहीं हिंसा करनेवाले (अर्हन्ता) आदर करने योग्य (देवौ) देनेवाले को मैं (पुरः) आगे (दधे) धारण करता हूँ और जो (देवौ) प्रकाशमान दोनों (चित्) भी (अर्वते) विज्ञान के लिये वर्त्तमान हैं (ता) उन दोनों का आप लोग सत्कार करें ॥५॥

भावार्थ : जो मनुष्य दिनरात्रि मनुष्यों के हित के लिये प्रयत्न करते हैं, वे ही सब से आदर करने योग्य हैं ॥५॥