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Rigveda / 6 / 6 / 3

वि ते॒ विष्व॒ग्वात॑जूतासो अग्ने॒ भामा॑सः शुचे॒ शुच॑यश्चरन्ति। तु॒वि॒म्र॒क्षासो॑ दि॒व्या नव॑ग्वा॒ वना॑ वनन्ति धृष॒ता रु॒जन्तः॑ ॥३॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 6 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : वि। ते॒। विष्व॑क्। वात॑ऽजूतासः। अ॒ग्ने॒। भामा॑सः। शु॒चे॒। शुच॑यः। च॒र॒न्ति॒। तु॒वि॒ऽम्र॒क्षासः॑। दि॒व्याः। नव॑ऽग्वाः। वना॑। व॒न॒न्ति॒। धृ॒ष॒ता। रु॒जन्तः॑ ॥३॥

पदार्थ : हे (शुचे) पवित्र (अग्ने) विद्वन् ! (ते)आपके जो (विष्वक्) सब का आदर करनेवाला और (वाजूतासः) वायु के सदृश वेगयुक्त (भामासः) क्रोध (शुचयः) पवित्र (वि, चरन्ति) विशेष करके चलते हैं (तुविम्रक्षासः) बहुतों के साथ मिले हुए (दिव्याः) अन्तरिक्ष में हुए (नवग्वाः) नवीन गमनवाले (धृषता) प्रगल्भता से (रुजन्तः) शत्रुओं को भग्न करते हुए (वना) आदर करने योग्य पदार्थों का (वनन्ति) उत्तम प्रकार सेवन करते हैं, वे पवित्र होते हैं ॥३॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जो बिजुली के सदृश पवित्र, दुष्टों में क्रोध करनेवाले, श्रेष्ठों के साथ मेल करने और नवीन विद्या को प्राप्त होनेवाले होवें, वे सब स्थानों में विचरते हुए अन्यों को जनावें ॥३॥