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Rigveda / 6 / 6 / 4

ये ते॑ शु॒क्रासः॒ शुच॑यः शुचिष्मः॒ क्षां वप॑न्ति॒ विषि॑तासो॒ अश्वाः॑। अध॑ भ्र॒मस्त॑ उर्वि॒या वि भा॑ति या॒तय॑मानो॒ अधि॒ सानु॒ पृश्नेः॑ ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 6 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : ये। ते॒। शु॒क्रासः॑। शुच॑यः। शु॒चि॒ष्मः॒। क्षाम्। वप॑न्ति। विऽसि॑तासः। अश्वाः॑। अध॑। भ्र॒मः। ते॒। उ॒र्वि॒या। वि। भा॒ति॒। या॒तय॑मानः। अधि॑। सानु॑। पृश्नेः॑ ॥४॥

पदार्थ : हे (शुचिष्मः) प्रकाशयुक्त विद्वान् ! (ये) जो (ते) आपके (शुक्रासः) पराक्रमयुक्त (शुचयः) पवित्र (विषितासः) व्याप्त (अश्वाः) शीघ्र चलनेवाले (क्षाम्) भूमि को (वपन्ति) बोते हैं (अध) इसके अनन्तर (ते) आप का (यातयमानः) दण्ड देता हुआ (भ्रमः) भ्रमण (उर्विया) बहुत प्रकार के प्रकाश से (पृश्नेः) अन्तरिक्ष के मध्य में (अधि) ऊपर के (सानु) विभाग में (वि, भाति) विशेष शोभित होता है, उन सब को आप उत्तम प्रकार शिक्षा दीजिये ॥४॥

भावार्थ : मनुष्यों को चाहिये कि अपने समीप में पवित्र और यथार्थ वक्ता पुरुषों की सदा रक्षा करें अथवा आप भी उनका सङ्ग करें ॥४॥