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Rigveda / 6 / 45 / 13

अभू॑रु वीर गिर्वणो म॒हाँ इ॑न्द्र॒ धने॑ हि॒ते। भरे॑ वितन्त॒साय्यः॑ ॥१॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 45 | Mantra No : 13

In Hindi:

ऋषि : शंयुर्बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर वह राजा क्या करे, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : अभूः॑। ऊँ॒ इति॑। वी॒र॒। गि॒र्व॒णः॒। म॒हान्। इ॒न्द्र॒। धने॑। हि॒ते। भरे॑। वि॒त॒न्त॒साय्यः॑ ॥१३॥

पदार्थ : हे (गिर्वणः) वाणियों से याचना किये गये (वीर) शूरता आदि गुणों से युक्त (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य्य के देनेवाले ! आप (महान्) महाशय (वितन्तसाय्यः) अत्यन्त विजय में होनेवाले हुए (हिते) सुखकारक (धने) धन में (उ) और (भरे) सङ्ग्राम में जीतनेवाले (अभूः) हूजिये ॥१३॥

भावार्थ : जो राजा सब के हित के प्राप्त होने की इच्छा करता हुआ पुरुषों में ज्ञानी, किये हुए को जाननेवाला और योद्धाओं का प्रिय होवे, उसके सदा ही विजय से प्रतिष्ठा और ऐश्वर्य्य बढ़े ॥१३॥