Rigveda / 6 / 45 / 14
या त॑ ऊ॒तिर॑मित्रहन्म॒क्षूज॑वस्त॒मास॑ति। तया॑ नो हिनुही॒ रथ॑म् ॥१४॥
Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 45 | Mantra No : 14
In English:
Seer : sha.myurbaarhaspatyaH | Devta : indra: | Metre : gaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : yaa ta uutiramitrahanmakShuujavastamaasati. tayaa no hinuhii ratham .14.
Component Words : yaa. te. uutiH. amitra.ahan. makShujavaH.atamaa. asati. tayaa. naH. hinuhi. ratham .14.
In Hindi:
ऋषि : शंयुर्बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : फिर राजा क्या करे, इस विषय को कहते हैं ॥
पदपाठ : या। ते॒। ऊ॒तिः। अ॒मि॒त्र॒ऽह॒न्। म॒क्षुज॑वःऽतमा। अस॑ति। तया॑। नः॒। हि॒नु॒हि॒। रथ॑म् ॥१४॥
पदार्थ : हे (अमित्रहन्) शत्रुओं के मारनेवाले ! (या) जो (ते) आपकी (मक्षूजवस्तमा) शीघ्र अतिशय वेग से युक्त (ऊतिः) रक्षा आदि क्रिया (असति) होवे (तया) उससे (नः) हम लोगों की (रथम्) विमान आदि वाहन को प्राप्त कराके (हिनुही) वृद्धि कीजिये ॥१४॥
भावार्थ : जो राजा वेग आदि गुणों से युक्त रक्षा से प्रजाओं को प्रसन्न करके उन्नति करे, वही निरन्तर वृद्धि को प्राप्त होवे ॥१४॥
In Sanskrit:
ऋषि : शंयुर्बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : पुना राजा किं कुर्य्यादित्याह ॥
पदपाठ : या। ते॒। ऊ॒तिः। अ॒मि॒त्र॒ऽह॒न्। म॒क्षुज॑वःऽतमा। अस॑ति। तया॑। नः॒। हि॒नु॒हि॒। रथ॑म् ॥१४॥
पदार्थ : (या) (ते) तव (ऊतिः) रक्षाद्या क्रिया (अमित्रहन्) अरिहन् (मक्षूजवस्तमा) सद्योऽतिशयेन वेगयुक्ता (असति) भवेत् (तया) (नः) (हिनुही) वर्धय। अत्र संहितायामिति दीर्घः। (रथम्) विमानादियानम् ॥१४॥
अन्वय : हे अमित्रहन् ! या ते मक्षूजवस्तमोतिरसति तया नो रथं प्रापय्य हिनुही ॥१४॥
भावार्थ : यो राजा वेगादिगुणयुक्तया रक्षया प्रजाः प्रसाद्योन्नयेत् स एव सततं वर्धेत ॥१४॥