Rigveda / 6 / 45 / 16
य एक॒ इत्तमु॑ ष्टुहि कृष्टी॒नां विच॑र्षणिः। पति॑र्ज॒ज्ञे वृष॑क्रतुः ॥१६॥
Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 45 | Mantra No : 16
In English:
Seer : sha.myurbaarhaspatyaH | Devta : indra: | Metre : nichRRidgaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : ya eka ittamu ShTuhi kRRiShTiinaa.m vicharShaNiH. patirjaj~ne vRRiShakratuH .16.
Component Words : yaH. ekaH. it. tam. uu.N iti. stuhi. kRRiShTiinaam. vi.acharShaNiH. patiH. jaj~ne. vRRiSha.akratuH .16.
In Hindi:
ऋषि : शंयुर्बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : फिर वह राजा कैसा होवे, इस विषय को कहते हैं ॥
पदपाठ : यः। एकः॑। इत्। तम्। ऊँ॒ इति॑। स्तु॒हि॒। कृ॒ष्टी॒नाम्। विऽच॑र्षणिः। पतिः॑। ज॒ज्ञे। वृष॑ऽक्रतुः ॥१६॥
पदार्थ : हे मनुष्य ! (यः) जो (एकः) सहायरहित (इत्) ही (कृष्टीनाम्) मनुष्यों का (पतिः) स्वामी (विचर्षणिः) देखनेवाला (वृषक्रतुः) बलयुक्त बुद्धिवाला (जज्ञे) होता है (तम्) उस वीर पुरुष की (उ) ही (स्तुहि) प्रशंसा करिये ॥१६॥
भावार्थ : हे प्रजाजनो ! जो सम्पूर्ण विद्या और श्रेष्ठ गुण, कर्म, स्वभाववाला निरन्तर न्याय से प्रजाओं के पालन में तत्पर होवे, उसको राजा मानो, दूसरे क्षुद्राशय को नहीं ॥१६॥
In Sanskrit:
ऋषि : शंयुर्बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : पुनः स राजा कीदृशो भवेदित्याह ॥
पदपाठ : यः। एकः॑। इत्। तम्। ऊँ॒ इति॑। स्तु॒हि॒। कृ॒ष्टी॒नाम्। विऽच॑र्षणिः। पतिः॑। ज॒ज्ञे। वृष॑ऽक्रतुः ॥१६॥
पदार्थ : (यः) (एकः) असहायः (इत्) एव (तम्) वीरपुरुषम् (उ) (स्तुहि) प्रशंसय (कृष्टीनाम्) मनुष्याणाम् (विचर्षणिः) विचक्षणो द्रष्टा (पतिः) स्वामी (जज्ञे) जायते (वृषक्रतुः) वृषा बलवती क्रतुः प्रज्ञा यस्य सः ॥१६॥
अन्वय : हे मनुष्य ! य एक इत्कृष्टीनां पतिर्विचर्षणिर्वृषक्रतुर्जज्ञे तमु स्तुहि ॥१६॥
भावार्थ : हे प्रजाजना योऽखिलविद्यः शुभगुणकर्मस्वभावः सततं न्यायेन प्रजापालनतत्परः स्यात्तमेव राजानं मन्यध्वं नेतरं क्षुद्राशयम् ॥१६॥