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Rigveda / 6 / 45 / 15

स रथे॑न र॒थीत॑मो॒ऽस्माके॑नाभि॒युग्व॑ना। जेषि॑ जिष्णो हि॒तं धन॑म् ॥१५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 45 | Mantra No : 15

In Hindi:

ऋषि : शंयुर्बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर वह राजा किससे किसको जीते, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : सः। रथे॑न। र॒थिऽत॑मः। अ॒स्माके॑न। अ॒भि॒ऽयुग्व॑ना। जेषि॑। जि॒ष्णो॒ इति॑। हि॒तम्। धन॑म् ॥१५॥

पदार्थ : हे (जिष्णो) जीतनेवाले (सः) वह (रथीतमः) अतिशय करके बहुत रथोंवाले आप (अभियुग्वना) विभक्त होनेवाले (अस्माकेन) हमारे (रथेन) वाहन से (हितम्) प्रवृद्ध (धनम्) धन को (जेषि) जीतते हो, इससे प्रशंसा करने योग्य होते हो ॥१५॥

भावार्थ : जो राजा प्रशंसनीय वाहन आदि से बहुत धन को जीतता है, वह प्रशंसनीय होता है ॥१५॥