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Rigveda / 6 / 46 / 8

यद्वा॑ तृ॒क्षौ म॑घवन्द्रु॒ह्यावा जने॒ यत्पू॒रौ कच्च॒ वृष्ण्य॑म्। अ॒स्मभ्यं॒ तद्रि॑रीहि॒ सं नृ॒षाह्ये॒ऽमित्रा॑न्पृ॒त्सु तु॒र्वणे॑ ॥८॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 46 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : शंयुर्बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्रः प्रगाथो वा | छन्द : विराड्बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : फिर वह राजा क्या करे, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : यत्। वा॒। तृ॒क्षौ। म॒घ॒ऽव॒न्। द्रु॒ह्यौ। आ। जने॑। यत्। पू॒रौ। कत्। च॒। वृष्ण्य॑म्। अ॒स्मभ्य॑म्। तत्। रि॒री॒हि॒। सम्। नृ॒ऽसह्ये॑। अ॒मित्रा॑न्। पृ॒त्ऽसु। तु॒र्वणे॑ ॥८॥

पदार्थ : हे (मघवन्) न्याय से धन इकट्ठा करनेवाले ! आप (तृक्षौ) विद्या और श्रेष्ठ गुणों से प्राप्त (द्रुह्यौ) द्रोह करने योग्य (जने) मनुष्य में (यत्) जो (रिरीहि) प्राप्त कराइये और (पूरौ) पूर्ण बलवाले मनुष्य में (यत्) जो (वृष्ण्यम्) उत्तमों में हितकारक जो बल उसको प्राप्त कराइये (तत्) वह (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये (च) और (कत्) कब प्राप्त कराइये और कब (वा) वा हम लोगों के (अमित्रान्) शत्रुओं को (नृषाह्ये) मनुष्यों से सहने योग्य सङ्ग्राम में (पृत्सु) सेनाओं में (तुर्वणे) हिंसन के लिये (सम्) अच्छे प्रकार (आ) सब ओर से प्राप्त कराइये ॥८॥

भावार्थ : हे राजन् ! जब आप उत्तम मनुष्यों में प्रतिष्ठा और दुष्टों में तिरस्कार धारण करें, तभी शत्रुओं के विजय के लिये योग्य होवें ॥८॥