Rigveda / 6 / 46 / 9
इन्द्र॑ त्रि॒धातु॑ शर॒णं त्रि॒वरू॑थं स्वस्ति॒मत्। छ॒र्दिर्य॑च्छ म॒घव॑द्भ्यश्च॒ मह्यं॑ च या॒वया॑ दि॒द्युमे॑भ्यः ॥९॥
Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 46 | Mantra No : 9
In English:
Seer : sha.myurbaarhaspatyaH | Devta : indraH pragaatho vaa | Metre : viraaDbRRihatii | Tone : madhyamaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : indra tridhaatu sharaNa.m trivaruutha.m svastimat. ChardiryachCha maghavadbhyashcha mahya.m cha yaavayaa didyumebhyaH .9.
Component Words : indra. tri.adhaatu. sharaNam. tri.avaruutham. svasti.amat. ChardiH. yachCha. maghavat.abhyaH. cha. mahyam. cha. yavaya. didyum. ebhyaH .9.
In Hindi:
ऋषि : शंयुर्बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्रः प्रगाथो वा | छन्द : विराड्बृहती | स्वर : मध्यमः
विषय : मनुष्य कैसे गृह को बनावें, इस विषय को कहते हैं ॥
पदपाठ : इन्द्र॑। त्रि॒ऽधातु॑। श॒र॒णम्। त्रि॒ऽवरू॑थम्। स्व॒स्ति॒ऽमत्। छ॒र्दिः। य॒च्छ॒। म॒घव॑त्ऽभ्यः। च॒। मह्य॑म्। च॒। य॒वय॑। दि॒द्युम्। ए॒भ्यः॒ ॥९॥
पदार्थ : हे (इन्द्र) ऐश्वर्य्यों से युक्त आप (त्रिधातु) तीन सुवर्ण, चाँदी और ताँबा ये धातु जिसमें उस (त्रिवरूथम्) शीत, उष्ण और वर्षा ऋतु में उत्तम (शरणम्) आश्रय करने योग्य (स्वस्तिमत्) बहुत सुख से युक्त (छर्दिः) गृह को (यच्छ) ग्रहण करिये वा दीजिये और जिन (मघवद्भ्यः) बहुत धनवालों के और (मह्यम्) मुझ धनयुक्त के लिये (च) भी ग्रहण करिये वा दीजिये (एभ्यः) इन वर्त्तमानों के लिये (दिद्युम्) सुप्रकाश को (च) भी (यावया) संयुक्त कराइये ॥९॥
भावार्थ : मनुष्यों को चाहिये कि जो सब ऋतुओं में सुखकारक, धन धान्य से युक्त, वृक्ष, पुष्प, फल, शुद्ध वायु जल तथा धार्मिक और धनाढ्यों से युक्त गृह उसको बनाकर वहाँ निवास करें, जिससे सर्वदा आरोग्य से सुख बढ़े ॥९॥
In Sanskrit:
ऋषि : शंयुर्बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्रः प्रगाथो वा | छन्द : विराड्बृहती | स्वर : मध्यमः
विषय : मनुष्याः कीदृशं गृहं निर्मिमीरन्नित्याह ॥
पदपाठ : इन्द्र॑। त्रि॒ऽधातु॑। श॒र॒णम्। त्रि॒ऽवरू॑थम्। स्व॒स्ति॒ऽमत्। छ॒र्दिः। य॒च्छ॒। म॒घव॑त्ऽभ्यः। च॒। मह्य॑म्। च॒। य॒वय॑। दि॒द्युम्। ए॒भ्यः॒ ॥९॥
पदार्थ : (इन्द्र) (त्रिधातु) त्रयः सुवर्णरजतताम्रा धातवो यस्मिंस्तत् (शरणम्) आश्रयितुं योग्यम् (त्रिवरूथम्) शीतोष्णवर्षासूत्तमम् (स्वस्तिमत्) बहुसुखयुक्तम् (छर्दिः) गृहम् (यच्छ) गृहाण देहि वा (मघवद्भ्यः) बहुधनेभ्यः (च) (मह्यम्) धनाढ्याय (च) (यावया) संयोजय। अत्र संहितायामिति दीर्घः। (दिद्युम्) सुप्रकाशम् (एभ्यः) वर्त्तमानेभ्यः ॥९॥
अन्वय : हे इन्द्र ! त्वं त्रिधातु त्रिवरूथं शरणं स्वस्तिमच्छर्दिर्यच्छ येभ्यो मघवद्भ्यो मह्यं च यच्छैभ्यो दिद्युं च यावया ॥९॥
भावार्थ : मनुष्यैर्यत्सर्वर्त्तुषु सुखकरं धनधान्ययुक्तं वृक्षपुष्पफलशुद्धवायूदकधार्मिकधनाढ्यसमन्वितं गृहं तन्निर्माय तत्र निवसनीयं यतः सर्वदाऽऽरोग्येन सुखं वर्धेत ॥९॥