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Rigveda / 1 / 40 / 4

यो वा॒घते॒ ददा॑ति सू॒नरं॒ वसु॒ स ध॑त्ते॒ अक्षि॑ति॒ श्रवः॑ । तस्मा॒ इळां॑ सु॒वीरा॒ मा य॑जामहे सु॒प्रतू॑र्तिमने॒हस॑म् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 40 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : कण्वो घौरः | देवता : बृहस्पतिः | छन्द : सतःपङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : विद्वान् और अन्य मनुष्यों को एक दूसरे के साथ क्या करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदपाठ : यः । वा॒घते॑ । ददा॑ति । सू॒नर॑म् । वसु॑ । सः । ध॒त्ते॒ । अक्षि॑ति । श्रवः॑ । तस्मै॑ । इळा॑म् । सु॒ऽवीराम् । आ । य॒जा॒म॒हे॒ । सु॒ऽप्रतू॑र्तिम् । अ॒ने॒हस॑म्॥

पदार्थ : (यः) जो मनुष्य (वाघते) विद्वान् के लिये (सूनरम्) जिससे उत्तम मनुष्य हों उस (वसु) धन को (ददाति) देता है और जिस (अनेहसम्) हिंसा के अयोग्य (सुप्रतूर्त्तिम्) उत्तमता से शीघ्र प्राप्ति कराने (सुवीराम्) जिससे उत्तम शूरवीर प्राप्त हों (इडाम्) पृथिवी वा वाणी को हम लोग (आयजामहे) अच्छे प्रकार प्राप्त होते हैं उससे (सः) वह पुरुष (अक्षिति) जो कभी क्षीणता को न प्राप्त हो उस (श्रवः) धन और विद्या के श्रवण को (धत्ते) करता है ॥४॥

भावार्थ : जो मनुष्य शरीर, वाणी, मन और धन से विद्वानों का सेवन करता है वही अक्षय विद्या को प्राप्त हो और पृथिवी के राज्य को भोग कर मुक्ति को प्राप्त होता है। जो पुरुष वाणी विद्या को प्राप्त होते हैं, वे विद्वान् दूसरे को भी पण्डित कर सकते हैं आलसी अविद्वान् पुरुष नहीं ॥४॥