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Rigveda / 1 / 40 / 5

प्र नू॒नं ब्रह्म॑ण॒स्पति॒र्मन्त्रं॑ वदत्यु॒क्थ्य॑म् । यस्मि॒न्निन्द्रो॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा दे॒वा ओकां॑सि चक्रिरे ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 40 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : कण्वो घौरः | देवता : बृहस्पतिः | छन्द : पथ्यावृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : अब ईश्वर कैसा है, उसका उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदपाठ : प्र । नू॒नम् । ब्रह्म॑णः । पतिः॑ । मन्त्र॑म् । व॒द॒ति॒ । उ॒क्थ्य॑म् । यस्मि॑न् । इन्द्रः॑ । वरु॑णः । मि॒त्रः । अ॒र्य॒मा । दे॒वाः । ओकां॑सि । च॒क्रि॒रे॥

पदार्थ : जो (ब्रह्मणस्पतिः) बड़े भारी जगत् और वेदों का पति स्वामी न्यायाधीश ईश्वर (नूनम्) निश्चय करके (उक्थ्यम्) कहने सुनने योग्य वेदवचनों में होनेवाले (मंत्रम्) वेदमन्त्र समूह का (प्रवदति) उपदेश करता है वा (यस्मिन्) जिस जगदीश्वर में (इन्द्रः) बिजुली (वरुणः) समुद्र चन्द्रतारे आदि लोकान्तर (मित्रः) प्राण (अर्यमा) वायु और (देवाः) पृथिवी आदिलोक और विद्वान् लोग (ओकांसि) स्थानों को (चक्रिरे) किये हुए हैं, उसी परमेश्वर का हम लोग सत्कार करें ॥५॥

भावार्थ : मनुष्यों को उचित है कि जिस ईश्वर ने वेदों का उपदेश किया है, जो सब जगत् में व्याप्त होकर स्थित है जिसमें सब पृथिवी आदि लोक रहते और मुक्ति समय में विद्वान् लोग निवास करते हैं; उसी परमेश्वर की उपासना करनी चाहिये इससे भिन्न किसी की नहीं ॥५॥