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Rigveda / 1 / 40 / 6

तमिद्वो॑चेमा वि॒दथे॑षु शं॒भुवं॒ मन्त्रं॑ देवा अने॒हस॑म् । इ॒मां च॒ वाचं॑ प्रति॒हर्य॑था नरो॒ विश्वेद्वा॒मा वो॑ अश्नवत् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 40 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : कण्वो घौरः | देवता : बृहस्पतिः | छन्द : सतःपङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : अब अगले मंत्र में सब मनुष्यों के लिये वेदों के पढ़ने का अधिकार है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदपाठ : तम् । इत् । वो॒चे॒म॒ । वि॒दथे॑षु । श॒म्भुव॑म् । मन्त्र॑म् । दे॒वाः॒ । अ॒ने॒हस॑म् । इ॒माम् । च॒ । वाच॑म् । प्रति॒ऽहर्य॑थ । न॒रः॒ । विश्वा॑ । इत् । वा॒मा । वः॒ । अ॒श्न॒व॒त्॥

पदार्थ : हे (देवाः) विद्वानो ! (वः) तुम लोगों के लिये हम लोग (विदथेषु) जानने योग्य पढ़ने-पढ़ाने आदि व्यवहारों में जिस (अनेहसम्) अहिंसनीय सर्वदा रक्षणीय दोषरहित (शंभुवम्) कल्याणकारक (मंत्रम्) पदार्थों को मनन करानेवाले मंत्र अर्थात् श्रुति समूह को (वोचेम) उपदेश करें (तम्) उस वेद को (इत्) ही तुम लोग ग्रहण करो (इत्) जो (इमाम्) इस (वाचम्) वेदवाणी को बार-२ जानों तो (विश्वा) सब (वामा) प्रशंसनीय वाणी (वः) तुम लोगों को (अश्नवत्) प्राप्त होवे ॥६॥

भावार्थ : विद्वानों को योग्य है कि विद्या के प्रचार के लिये मनुष्यों को निरन्तर अर्थ अंग उपांग रहस्य स्वर और हस्तक्रिया सहित वेदों को उपदेश करें और ये लोग अर्थात् मनुष्यमात्र इन विद्वानों से सब वेद विद्या को साक्षात् करें जो कोई पुरुष सुख चाहें तो वह विद्वानों के संग से विद्या को प्राप्त करें तथा इस विद्या के विना किसी को सत्य सुख नहीं होता इससे पढ़ने-पढ़ाने वालों को प्रयत्न से सकल विद्याओं को ग्रहण करना वा कराना चाहिये ॥६॥