Rigveda / 6 / 51 / 4
रि॒शाद॑सः॒ सत्प॑तीँ॒रद॑ब्धान्म॒हो राज्ञः॑ सुवस॒नस्य॑ दा॒तॄन्। यूनः॑ सुक्ष॒त्रान्क्षय॑तो दि॒वो नॄना॑दि॒त्यान्या॒म्यदि॑तिं दुवो॒यु ॥४॥
Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 51 | Mantra No : 4
In English:
Seer : RRijishvaaH | Devta : vishvedevaa: | Metre : svaraaTpa~Nkti | Tone : pa~nchamaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : rishaadasaH satpatii.Nradabdhaanmaho raaj~naH suvasanasya daatRRIn. yuunaH sukShatraankShayato divo nRRInaadityaanyaamyaditi.m duvoyu .4.
Component Words : rishaadasaH. sat.apatiin. adabdhaan. mahaH. raaj~naH. su.avasanasya. daatRRIn. yuunaH. su.akShatraan. kShayataH. divaH. nRRIn. aadityaan. yaami. aditim. duvaH.ayu .4.
In Hindi:
ऋषि : ऋजिश्वाः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : स्वराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
विषय : फिर मनुष्य कैसे राजजनों को मानें, इस विषय को कहते हैं ॥
पदपाठ : रि॒शाद॑सः। सत्ऽप॑तीन्। अद॑ब्धान्। म॒हः। राज्ञः॑। सु॒ऽव॒स॒नस्य॑। दा॒तॄन्। यूनः॑। सु॒ऽक्ष॒त्रान्। क्षय॑तः। दि॒वः। नॄन्। आ॒दि॒त्यान्। या॒मि॒। अदि॑तिम्। दु॒वः॒ऽयु ॥४॥
पदार्थ : हे मनुष्यो ! जैसे मैं (रिशादसः) हिंसक वा नाश करनेवाले वा (सत्पतीन्) सत्य के पालनेवाले वा (अदब्धान्) विनाश को न प्राप्त हुए उनको वा न हिंसनेवाले वा (सुवसनस्य) सुन्दर वास के (दातॄन्) देनेवाले वा (सुक्षत्रान्) उत्तम धन और राज्यों को वा (अदितिम्) अखण्डित नीति को (क्षयतः) स्थिर होते हुए (दिवः) कामना करने योग्य और काम करने वा (नॄन्) मनुष्यों वा (आदित्यान्) किया है अड़तालीस वर्ष ब्रह्मचर्य्य जिन्होंने उन वा (यूनः) जवान मनुष्यों वा (दुवोयु) सेवन की कामना करनेवालों को तथा (महः) महान् (राज्ञः) राजाओं को मैं (यामि) प्राप्त होता हूँ, वैसे ऐसों को तुम भी प्राप्त होओ ॥४॥
भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जो चोर आदि के निकासने और धर्मात्माओं के पालनेवाले, हिंसादि दोषों से रहित, सब के लिये सुख से निवास देनेवाले, पूर्ण विद्यायुक्त, जितेन्द्रिय, न्याय से पिता के समान प्रजा के पालनेवाले, पूर्ण यौवनयुक्त, दुष्ट व्यसनों से रहित, गुणग्राही जन हों; उन्हीं को तुम स्वामी मानो और क्षुद्र हृदयवालों को न मानो ॥४॥
In Sanskrit:
ऋषि : ऋजिश्वाः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : स्वराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
विषय : पुनर्मनुष्याः कीदृशान् पार्थिवान् मन्येरन्नित्याह ॥
पदपाठ : रि॒शाद॑सः। सत्ऽप॑तीन्। अद॑ब्धान्। म॒हः। राज्ञः॑। सु॒ऽव॒स॒नस्य॑। दा॒तॄन्। यूनः॑। सु॒ऽक्ष॒त्रान्। क्षय॑तः। दि॒वः। नॄन्। आ॒दि॒त्यान्। या॒मि॒। अदि॑तिम्। दु॒वः॒ऽयु ॥४॥
पदार्थ : (रिशादसः) हिंसकान् नाशकान् (सत्पतीन्) सत्यस्य पालकान् (अदब्धान्) अहिंसितानहिंसकान् (महः) महतः (राज्ञः) नृपान् (सुवसनस्य) सुष्ठुवासस्य (दातॄन्) (यूनः) प्राप्तयौवनान् (सुक्षत्रान्) उत्तमधनाञ्छ्रेष्ठराज्यान् वा (क्षयतः) निवसतः (दिवः) कमनीयान् कामयमानान् वा (नॄन्) (आदित्यान्) कृताष्टचत्वारिंशद्[वर्ष]ब्रह्मचर्येण पूर्णविदुषः (यामि) प्राप्नोमि (अदितिम्) अखण्डितां नीतिम् (दुवोयु) दुवः परिचरणं कामयमानान् ॥४॥
अन्वय : हे मनुष्या ! यथाहं रिशादसः सत्पतीनदब्धान् सुवसनस्य दातॄन् सुक्षत्रानदितिं क्षयतो दिवो नॄनादित्यान् यूनो दुवोयु महो राज्ञो यामि तथेदृशान् यूयमपि प्राप्नुत ॥४॥
भावार्थ : अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। हे मनुष्या ! ये चोरादीनां निष्कासका धर्मात्मनां पालका हिंसादिदोषरहिताः सर्वस्मै सुखेन वासं ददन्तः पूर्णविद्याजितेन्द्रिया न्यायेन पितृवत्प्रजापालकाः पूर्णयौवना दुर्व्यसनविरहा गुणग्राहिणः स्युस्तानेव यूयं स्वामिनो मन्यध्वं नेतरान् क्षुद्राशयान् ॥४॥