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Rigveda / 6 / 51 / 5

द्यौ॒३॒॑ष्पितः॒ पृथि॑वि॒ मात॒रध्रु॒गग्ने॑ भ्रातर्वसवो मृ॒ळता॑ नः। विश्व॑ आदित्या अदिते स॒जोषा॑ अ॒स्मभ्यं॒ शर्म॑ बहु॒लं वि य॑न्त ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 51 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : ऋजिश्वाः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : पित्रादिकों को सन्तानों के लिये क्या करना योग्य है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : द्यौः॑। पितः॑। पृ॒थि॑वि। मातः॑। अध्रु॑क्। अग्ने॑। भ्रा॒तः॒। व॒स॒वः॒। मृ॒ळत॑। नः॒। विश्वे॑। आ॒दि॒त्याः॒। अ॒दि॒ते॒। स॒ऽजोषाः॑। अ॒स्मभ्य॑म्। शर्म॑। ब॒हु॒लम्। वि। य॒न्त॒ ॥५॥

पदार्थ : हे (पितः) पालनेवाले (द्यौः) सूर्य्य के समान ! तुम हे (मातः) माता (पृथिवि) भूमि के समान ! तुम हे (अग्ने) अग्नि के समान प्रकाशात्मा (भ्रातः) भ्राता ! तुम (अध्रुक्) द्रोहरहित होते हुए (वसवः) सुख वास के देनेवाले तुम सब (नः) हमको (मृळता) सुखी करो हे (अदिते) अखण्डिते ज्ञान और ऐश्वर्य्यवती पण्डिता स्त्री ! जैसे (विश्वे) सब (आदित्याः) पूर्ण की है ब्रह्मचर्य्य से विद्या जिन्होंने वे सज्जन (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये (बहुलम्) बहुत पदार्थयुक्त (शर्म) सुख करनेवाले घर को (वि, यन्त) देते हैं, वैसे (सजोषाः) समान एकसी प्रीति को सेवनेवाली तू बहुत सुख और विद्या को दे ॥५॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जिनका सूर्य के समान सुन्दर शिक्षा से पालनेवाला पिता, पृथिवी के समान सहनशीलता आदि गुण और विद्यायुक्त माता, अग्नि के समान प्रकाशमान भ्राता वर्त्तमान है, वही सुखी होता है तथा जिसे पूर्ण विद्यावान् जन सन्मार्ग को पूँछते [=देते] हैं, वैसे ही विद्या पढ़नेवाले पढ़ानेवालों का निरन्तर सत्कार करते हैं ॥५॥