Rigveda / 6 / 59 / 3
ओ॒कि॒वांसा॑ सु॒ते सचाँ॒ अश्वा॒ सप्ती॑इ॒वाद॑ने। इन्द्रा॒ न्व१॒॑ग्नी अव॑से॒ह व॒ज्रिणा॑ व॒यं दे॒वा ह॑वामहे ॥३॥
Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 59 | Mantra No : 3
In English:
Seer : bharadvaajo baarhaspatyaH | Devta : indraagnii | Metre : nichRRidbRRihatii | Tone : madhyamaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : okivaa.msaa sute sachaa.N ashvaa saptiiivaadane. indraa nva1gnii avaseha vajriNaa vaya.m devaa havaamahe .3.
Component Words : oki.avaa.msaa. sute. sachaa. ashvaa. saptiiiveti saptii.aiva. aadane. indraa. nu. agnii iti. avasaa. iha. vajriNaa. vayam. devaa. havaamahe .3.
In Hindi:
ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्राग्नी | छन्द : निचृद्बृहती | स्वर : मध्यमः
विषय : फिर विद्वान् जन क्या जानकर कैसे हों, इस विषय को कहते हैं ॥
पदपाठ : ओ॒कि॒ऽवांसा॑। सु॒ते। सचा॑। अश्वा॑। सप्ती॑इ॒वेति॒ सप्ती॑ऽइव। आद॑ने। इन्द्रा॑। नु। अ॒ग्नी इति॑। अव॑सा। इ॒ह। व॒ज्रिणा॑। व॒यम्। दे॒वा। ह॒वा॒म॒हे॒ ॥३॥
पदार्थ : हे मनुष्यो ! जैसे (देवा) विद्वान् (वयम्) हम लोग (अवसा) रक्षा आदि से (इह) इस संसार में (सुते) निष्पन्न हुए व्यवहार में (सचा) अच्छे प्रकार युक्त (अश्वाः) और व्याप्त हुए (वज्रिणा) प्रशंसित शस्त्र-अस्त्रवाले (ओकिवांसा) सङ्ग और सम्बन्ध को प्राप्त हुए (सप्तीइव) जैसे दो घोड़े (आदने) भक्षण करने योग्य घास अदन के निमित्त वर्त्तमान, वैसे (इन्द्राग्नी) पवन और बिजुली की (नु) शीघ्र (हवामहे) प्रशंसा करते हैं, वैसे इनकी तुम भी प्रशंसा करो ॥३॥
भावार्थ : इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो विद्वान् जन सदा मिले हुए वायु और बिजुली इन दोनों पदार्थों को जानते हैं, वे इस संसार में अद्भुत क्रियाओं को कर सकते हैं ॥३॥
In Sanskrit:
ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्राग्नी | छन्द : निचृद्बृहती | स्वर : मध्यमः
विषय : पुनर्विद्वांसः किं विज्ञाय कीदृशा भवेयुरित्याह ॥
पदपाठ : ओ॒कि॒ऽवांसा॑। सु॒ते। सचा॑। अश्वा॑। सप्ती॑इ॒वेति॒ सप्ती॑ऽइव। आद॑ने। इन्द्रा॑। नु। अ॒ग्नी इति॑। अव॑सा। इ॒ह। व॒ज्रिणा॑। व॒यम्। दे॒वा। ह॒वा॒म॒हे॒ ॥३॥
पदार्थ : (ओकिवांसा) सङ्गतौ सम्बद्धौ (सुते) निष्पन्ने (सचा) सचौ समवेतौ (अश्वा) व्याप्तौ (सप्तीइव) यथा युग्मावश्वौ (आदने) अत्तव्ये घासे (इन्द्रा) (नु) (अग्नी) वायुविद्युतौ (अवसा) (इह) अस्मिन् संसारे (वज्रिणा) प्रशस्ताऽस्त्रयुक्तौ (वयम्) (देवा) विद्वांसः (हवामहे) प्रशंसामः ॥३॥
अन्वय : हे मनुष्या ! यथा देवा वयमवसेह सुते सचाऽश्वा वज्रिणौकिवांसा सप्तीइवादने वर्त्तमानाविन्द्राग्नी नु हवामहे तथेमौ यूयमपि प्रशंसत ॥३॥
भावार्थ : अत्रोपमावाचकलुप्तोपमालङ्कारौ। ये विद्वांसः सदा मिलितौ वायुविद्युतौ पदार्थौ विजानन्ति तेऽस्मिन् संसारेऽद्भुताः क्रियाः कर्तुं शक्नुवन्ति ॥३॥