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Rigveda / 6 / 59 / 4

य इ॑न्द्राग्नी सु॒तेषु॑ वां॒ स्तव॒त्तेष्वृ॑तावृधा। जो॒ष॒वा॒कं वद॑तः पज्रहोषिणा॒ न दे॑वा भ॒सथ॑श्च॒न ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 59 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्राग्नी | छन्द : निचृद्बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : फिर विद्वान् जन कैसे हों, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : यः। इ॒न्द्रा॒ग्नी॒ इति॑। सु॒तेषु॑। वा॒म्। स्तव॑त्। तेषु॑। ऋ॒त॒ऽवृ॒धा॒। जो॒ष॒ऽवा॒कम्। वद॑तः। प॒ज्र॒ऽहो॒षि॒णा॒। न। दे॒वा॒। भ॒सथः॑। च॒न ॥४॥

पदार्थ : हे (पज्रहोषिणा) प्राप्त हुई वाणी वा घोषयुक्त (ऋतावृधा) सत्य बढ़ानेवाले (इन्द्राग्नी) वायु और बिजुली के समान अध्यापक और उपदेशको ! (यः) जो (तेषु) उन (सुतेषु) उत्पन्न हुए पदार्थों में (वाम्) तुम दोनों की (स्तवत्) प्रशंसा करे वा जो (देवा) विद्वान् जन (चन) भी (न) नहीं (भसथः) व्यर्थ वाद करते हैं, उस सर्वजन के प्रति तुम दोनों (जोषवाकम्) प्रीति करनेवाले वचन (वदतः) कहते हो, वह सर्वजन भी तुम्हारे प्रति कहे ॥४॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! सर्व पदार्थों में प्रविष्ट वायु और बिजुली को जानकर ऐश्वर्य को प्राप्त होकर रूखी असत्य किया और लोक विद्वेषी जनों को जान सबके उपकार के लिये सत्य प्रिय वाक्य सर्वदा कहो ॥४॥