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Rigveda / 6 / 75 / 16

अव॑सृष्टा॒ परा॑ पत॒ शर॑व्ये॒ ब्रह्म॑संशिते। गच्छा॒मित्रा॒न्प्र प॑द्यस्व॒ मामीषां॒ कं च॒नोच्छि॑षः ॥१६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 75 | Mantra No : 16

In Hindi:

ऋषि : पायुर्भारद्वाजः | देवता : इषवः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर सेनापति सेना को क्या आज्ञा दे, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : अव॑ऽसृष्टा। परा॑। प॒त॒। शर॑व्ये। ब्रह्म॑ऽसंशिते। गच्छ॑। अ॒मित्रा॑न्। प्र। प॒द्य॒स्व॒। मा। अ॒मीषा॑म्। कम्। च॒न। उत्। शि॒षः॒ ॥१६॥

पदार्थ : हे (शरव्ये) बाणों को व्याप्त होनेवालों में उत्तम (ब्रह्मशंसिते) वेद जाननेवाले सेनापति से प्रशंसा पाई हुई सेना ! तू (अवसृष्टा) शत्रुओं के उपर पड़ी हुई (परा) हम लोगों से पराङ्मुख (पत) जाओ तथा (अमित्रान्) शत्रुओं के समीप (गच्छ) पहुँचो (प्र, पद्यस्व) प्राप्त होओ अर्थात् शत्रुजनों पर चढ़ाई करो और (अमीषाम्) परोक्षस्थ शत्रुओं के बीच (कम्, चन) किसी को भी (मा) मत (उत्, शिषः) शेष छोड़ो ॥१६॥

भावार्थ : सेनापति पहिले सेना को अच्छी शिक्षा देकर जब सङ्ग्राम में उपस्थित हो, तब अपनी सेना को आज्ञा दे कि शत्रुओं के बीच से एक को भी न छोड़ ॥१६॥