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Rigveda / 7 / 7 / 5

असा॑दि वृ॒तो वह्नि॑राजग॒न्वान॒ग्निर्ब्र॒ह्मा नृ॒षद॑ने विध॒र्ता। द्यौश्च॒ यं पृ॑थि॒वी वा॑वृ॒धाते॒ आ यं होता॒ यज॑ति वि॒श्ववा॑रम् ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 7 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर अग्नि कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : असा॑दि। वृ॒तः। वह्निः॑। आ॒ऽज॒ग॒न्वान्। अ॒ग्निः। ब्र॒ह्मा। नृ॒ऽसद॑ने। वि॒ऽध॒र्ता। द्यौः। च॒। यम्। पृ॒थि॒वी। व॒वृ॒धाते॒ इति॑। आ। यम्। होता॑। यज॑ति। वि॒श्वऽवा॑रम् ॥५॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जैसे (नृषदने) मनुष्यों के स्थान में (ब्रह्मा) चार वेद का जाननेवाला होता है, वैसे जो (वृतः) स्वीकार किया (आजगन्वान्) अच्छे प्रकार प्राप्त होनेवाला (वह्निः) पहुँचानेवाले (अग्निः) अग्नि के तुल्य (विधर्ता) विशेष कर धारणकर्ता (असादि) अच्छे प्रकार स्थित होता है (यम्) जिसको (द्यौः) सूर्य (च) और (पृथिवी) भूमि (वावृधाते) बढ़ाते हैं (यम्) जिस (विश्ववारम्) सबको स्वीकार करने योग्य को (होता) होमकर्ता (आ, यजति) अच्छे प्रकार सङ्ग करता है, उस को सब लोग जानें ॥५॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अग्नि यथावत् सम्प्रयोग किया हुआ सब कार्य्यों को सिद्ध करता है, वैसे ही सत्कार कर स्वीकार किये वेद के विद्वान् लोग धर्मार्थ-काम-मोक्ष पदार्थों को सबको प्राप्त कराते हैं ॥५॥