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Rigveda / 7 / 7 / 6

ए॒ते द्यु॒म्नेभि॒र्विश्व॒माति॑रन्त॒ मन्त्रं॒ ये वारं॒ नर्या॒ अत॑क्षन्। प्र ये विश॑स्ति॒रन्त॒ श्रोष॑माणा॒ आ ये मे॑ अ॒स्य दीध॑यन्नृ॒तस्य॑ ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 7 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर कौन श्रेष्ठ विद्वान् होते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : ए॒ते। द्यु॒म्नेभिः। विश्व॑म्। आ। अ॒ति॒र॒न्त॒। मन्त्र॑म्। ये। वा॒। अर॑म्। नर्याः॑। अत॑क्षन्। प्र। ये। विशः॑। ति॒रन्त॑। श्रोष॑माणाः। आ। ये। मे॒। अ॒स्य। दीध॑यन्। ऋ॒तस्य॑ ॥६॥

पदार्थ : हे मनुष्यो (ये) जो (एते) ये (नर्याः) मनुष्यों में श्रेष्ठ (द्युम्नेभिः) धन वा कीर्त्ति से (विश्वम्) समस्त (मन्त्रम्) विचार को (आ, अतिरन्त) अच्छे प्रकार पार होते (वा, अरम्) अथवा पूर्ण कार्य्य को (अतक्षन्) तीक्ष्णता से करते (ये) जो (श्रोषमाणाः) सुनते हुए (विशः) प्रजाजनों को (प्र, तिरन्त) अच्छे तरते और (ये) जो (मे) मेरे (अस्य) इस (ऋतस्य) सत्य विज्ञान को (आ, दीधयन्) अच्छे प्रकार प्रकाशित करते हैं, वे अभीष्ट को प्राप्त होते हैं ॥६॥

भावार्थ : जो मनुष्य सुन्दर विचार के साथ स्वीकार करने योग्य पदार्थों को प्राप्त होते और नित्य विद्वानों के वचनों के श्रोता होकर सत्य झूठ का विवेक कर असत्य छोड़ सत्य का ग्रहण कर यशस्वी धनाढ्य होते हैं, वही इस जगत् में सत्कार के योग्य होते हैं ॥६॥