Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 1 / 46 / 8

अ॒रित्रं॑ वां दि॒वस्पृ॒थु ती॒र्थे सिन्धू॑नां॒ रथः॑ । धि॒या यु॑युज्र॒ इन्द॑वः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 46 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : प्रस्कण्वः काण्वः | देवता : अश्विनौ | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर वह यान किस प्रकार का करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदपाठ : अ॒रित्र॑म् । वा॒म् । दि॒वः । पृ॒थु । ती॒र्थे । सिन्धू॑नाम् । रथः॑ । धि॒या । यु॒यु॒ज्रे॒ । इन्द॑वः॥

पदार्थ : हे कारीगरो ! जो (वाम्) आप लोगों का (पृथु) विस्तृत (रथः) यानसमूह अर्थात् अनेकविध सवारी हैं उनको (सिंधूनाम्) समुद्रों के (तीर्थे) तराने वाले में (अरित्रम्) यान रोकने और बहुत जल के थाह ग्रहणार्थ लोहे का साधन (दिवः) प्रकाशमान बिजुली अग्न्यादि और (इन्दवः) जलादिको आप (युयुज्रे) युक्त कीजिये ॥८॥

भावार्थ : कोई भी मनुष्य अग्नि आदि से जलनेवाले यान अर्थात् सवारी के विना पृथिवी समुद्र और अन्तरिक्ष में सुख से आने जाने को समर्थ नहीं हो सकता ॥८॥