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Rigveda / 1 / 46 / 9

दि॒वस्क॑ण्वास॒ इन्द॑वो॒ वसु॒ सिन्धू॑नां प॒दे । स्वं व॒व्रिं कुह॑ धित्सथः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 46 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : प्रस्कण्वः काण्वः | देवता : अश्विनौ | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर वे क्या करें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदपाठ : दि॒वः । क॒ण्वा॒सः॒ । इन्द॑वः । वसु॑ । सिन्धू॑नाम् । प॒दे । स्वम् । व॒व्रिम् । कुह॑ । धि॒त्स॒थः॒॥

पदार्थ : हे (कण्वासः) मेधावी विद्वान् लोगो ! तुम इन कारीगरों को पूछो कि तुम लोग (सिन्धूनाम्) समुद्रों के (पदे) मार्ग में जो (दिवः) प्रकाशमान अग्नि और (इन्दवः) जल आदि हैं उन्हें और (स्वम्) अपना (वव्रिं) सुन्दर रूप युक्त (वसु) धन (कुह) कहां (धित्सथः) धरने की इच्छा करते हो ॥९॥

भावार्थ : जो मनुष्य लोग विद्वानों की शिक्षा के अनुकूल अग्नि जल के प्रयोग से युक्त यानों पर स्थित होके राजा प्रजा के व्यवहार की सिद्धि के लिये समुद्रों के अन्त में जावें आवें तो बहुत उत्तमोत्तम धन को प्राप्त होवें ॥९॥