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Rigveda / 7 / 49 / 4

यासु॒ राजा॒ वरु॑णो॒ यासु॒ सोमो॒ विश्वे॑ दे॒वा यासूर्जं॒ मद॑न्ति। वै॒श्वा॒न॒रो यास्व॒ग्निः प्रवि॑ष्ट॒स्ता आपो॑ दे॒वीरि॒ह माम॑वन्तु ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 49 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : आपः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : यासु॑। राजा॑। वरु॑णः। यासु॑। सोमः॑। विश्वे॑। दे॒वाः। यासु॑। ऊर्ज॑म्। मद॑न्ति। वै॒श्वा॒न॒रः। यासु॑। अ॒ग्निः। प्रऽवि॑ष्टः। ताः। आपः॑। दे॒वीः। इ॒ह। माम्। अ॒व॒न्तु॒ ॥४॥

पदार्थ : हे विद्वानो ! (यासु) जिन अन्तरिक्ष जल वा प्राणों में (वरुणः) श्रेष्ठ गुण-कर्म-स्वभावयुक्त (राजा) न्याय और विनय नम्रता से प्रकाशमान (यासु) वा जिन में (सोमः) ओषधिगण और (यासु) जिन में (विश्वे) समस्त (देवाः) विद्वान् जन अथवा पृथिवी आदि लोक (ऊर्जम्) बल पराक्रम को (मदन्ति) प्राप्त होते हैं या (यासु) जिन में (वैश्वानरः) सब में वा मनुष्यों में प्रकाशमान परमात्मा वा (अग्निः) बिजुलीरूप अग्नि (प्रविष्टः) प्रविष्ट है (ताः) वे (देवीः) मनोहर (आपः) जल (इह) इस संसार में (माम्) मेरी (अवन्तु) रक्षा करें ॥४॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जिस आकाश में, प्राणों में वा जल में सब जगत् जीवन धारण करता है वा जिन प्राणों में स्थित योगी जन परमात्मा को प्राप्त होता है वा जहाँ बिजुली प्रविष्ट है, उन जलों को तुम जान कर रक्षायुक्त होओ ॥४॥ इस सूक्त में जलादि कों के गुण और कृत्यों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह उनपचासवाँ सूक्त और सोलहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥