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Rigveda / 7 / 50 / 1

आ मां मि॑त्रावरुणे॒ह र॑क्षतं कुला॒यय॑द्वि॒श्वय॒न्मा न॒ आ ग॑न्। अ॒ज॒का॒वं दु॒र्दृशी॑कं ति॒रो द॑धे॒ मा मां पद्ये॑न॒ रप॑सा विद॒त्त्सरुः॑ ॥१॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 50 | Mantra No : 1

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : मित्रावरुणौ | छन्द : स्वराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब चार ऋचावाले पचासवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्यों को इस संसार में क्या आचरण करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : आ। माम्। मि॒त्रा॒व॒रु॒णा॒। इ॒ह। र॒क्ष॒त॒म्। कु॒ला॒यय॑त्। वि॒ऽश्वय॑त्। मा। नः॒। आ। ग॒न्। अ॒ज॒का॒ऽवम्। दुः॒ऽदृशी॑कम्। ति॒रः। द॒धे॒। मा। माम्। पद्ये॑न। रप॑सा। वि॒द॒त्। त्सरुः॑ ॥१॥

पदार्थ : हे (मित्रावरुणा) प्राण और उदान के समान अध्यापक और उपदेशक ! तुम (इह) इस संसार में जो मैं (कुलाययत्) कुल की उन्नति चाहता हुआ (विश्वयत्) सब काम करनेवाला (दुर्दृशीकम्) दुःख से देखने योग्य (अजकावम्) जीवों को पीड़ा देता उसको (तिरोदधे) निवारणे करता हूँ वह (त्सरुः) कुटिल गति रोग (पद्येन) प्राप्त होने योग्य (रपसा) पाप से (माम्) मुझे (मा) मत (विदत्) प्राप्त हो कोई पीड़ा (नः) हम लोगों को (मा) मत (आ, गन्) प्राप्त हो इससे (माम्) मेरी (आ, रक्षतम्) सब ओर से रक्षा करो ॥१॥

भावार्थ : मनुष्यों को पापाचरण वा कुपथ्य कभी न करना चाहिये जिससे कभी रोगप्राप्ति न हो, जो इस संसार में अध्यापक और उपदेशक हैं, वे पढ़ाने और उपदेश करने से सब को अरोगी कर सीधे और उद्योगी करें ॥१॥