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Rigveda / 1 / 47 / 10

उ॒क्थेभि॑र॒र्वागव॑से पुरू॒वसू॑ अ॒र्कैश्च॒ नि ह्व॑यामहे । शश्व॒त्कण्वा॑नां॒ सद॑सि प्रि॒ये हि कं॒ सोमं॑ प॒पथु॑रश्विना ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 47 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : प्रस्कण्वः काण्वः | देवता : अश्विनौ | छन्द : सतःपङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उनके प्रति प्रजाजन क्या करें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदपाठ : उ॒क्थेभिः॑ । अ॒र्वाक् । अव॑से । पु॒रु॒वसू॒ इति॑ पु॒रु॒ऽवसू॑ । अ॒र्कैः । च॒ । नि । ह्व॒या॒म॒हे॒ । शश्व॑त् । कण्वा॑नाम् । सद॑सि । प्रि॒ये । हि । क॒म् । सोम॑म् । प॒पथुः॑ । अ॒श्वि॒ना॒॥

पदार्थ : हे (पुरूवसू) बहुत विद्वानों में वसनेवाले (अश्विना) वायु और सूर्य के समान वर्त्तमान धर्म्म और न्याय के प्रकाशक ! (अवसे) रक्षादि के अर्थ हम लोग (उक्थेभिः) वेदोक्त स्तोत्र वा वेदविद्या के जानने वाले विद्वानों के इष्ट वचनों के (अर्कैः) विचार से जहां (कण्वानाम्) विद्वानों की (प्रिये) पियारी (सदसि) सभा में आप लोगों को (निह्वयामहे) अतिशय श्रद्धा कर बुलाते हैं वहां तुम लोग (अर्वाक्) पीछे (शश्वत्) सनातन (कम्) सुख को प्राप्त होओ (च) और (हि) निश्चय से (सोमम्) सोमवल्ली आदि ओषधियों के रसों को (पपथुः) पिओ ॥१०॥

भावार्थ : राजप्रजा जनों को चाहिये कि विद्वानों की सभा में जाकर नित्य उपदेश सुनें जिससे सब करने और न करने योग्य विषयों का बोध हो ॥१०॥ यहां राजा और प्रजा के धर्म्म का वर्णन होने से इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगती जाननी चाहिये ॥ ॥यह दूसरा २ वर्ग और सैंतालीसवां ४७ सूक्त समाप्त हुआ॥