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Rigveda / 1 / 48 / 1

स॒ह वा॒मेन॑ न उषो॒ व्यु॑च्छा दुहितर्दिवः । स॒ह द्यु॒म्नेन॑ बृह॒ता वि॑भावरि रा॒या दे॑वि॒ दास्व॑ती ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 48 | Mantra No : 1

In Hindi:

ऋषि : प्रस्कण्वः काण्वः | देवता : उषाः | छन्द : विराट्पथ्याबृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : अब अड़तालीसवें सूक्त का आरम्भ है। उसके पहिले मंत्र में उषा के समान पुत्रियों के गुण होने चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदपाठ : स॒ह । वा॒मेन॑ । नः॒ । उ॒षः॒ । वि । उ॒च्छ॒ । दु॒हि॒तः॒ । दि॒वः॒ । स॒ह । द्यु॒म्नेन॑ । बृ॒ह॒ता । वि॒भा॒ऽव॒रि॒ । रा॒या । दे॒वि॒ । दास्व॑ती॥

पदार्थ : हे (दिवः) सूर्यप्रकाश की (दुहितः) पुत्री के समान (उषः) उषा के तुल्य वर्त्तमान (विभावरि) विविध दीप्ति युक्त (देवि) विद्या सुशिक्षाओं से प्रकाशमान कन्या (दास्वती) प्रशस्त दानयुक्त ! तू (बृहता) बड़े (वामेन) प्रशंसित प्रकाश (द्युम्नेन) न्यायप्रकाश करके सहित (राया) विद्या चक्रवर्त्ति राज्य लक्ष्मी के (सहः) सहित (नः) हम लोगों को (व्युच्छ) विविध प्रकार प्रेरणा करें ॥१॥

भावार्थ : यहां वाचकलुप्तोपमालंकार है। जैसे कोई स्वामी भृत्य को वा भृत्य स्वामी को सचेत कर व्यवहारों में प्रेरणा करता है और जैसे उषा अर्थात् प्रातःकाल की वेला प्राणियों को पुरुषार्थ युक्त कर बड़े-२ पदार्थसमूह युक्त सुख से आनन्दित कर सायंकाल में सब व्यवहारों से निवृत्त कर आरामस्थ करती है वैसे ही माता-पिता विद्या और अच्छी शिक्षा आदि व्यवहारों में अपनी कन्याओं को प्रेरणा करें ॥१॥