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Rigveda / 1 / 79 / 2

आ ते॑ सुप॒र्णा अ॑मिनन्तँ॒ एवैः॑ कृ॒ष्णो नो॑नाव वृष॒भो यदी॒दम्। शि॒वाभि॒र्न स्मय॑मानाभि॒रागा॒त्पत॑न्ति॒ मिहः॑ स्त॒नय॑न्त्य॒भ्रा ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 79 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर वह विद्वान् कैसा हो, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदपाठ : आ। ते॒। सु॒ऽप॒र्णाः। अ॒मि॒न॒न्त॒। एवैः॑। कृ॒ष्णः। नो॒ना॒व॒। वृ॒ष॒भः। यदि॑। इ॒दम्। शि॒वाभिः॑। न। स्मय॑मानाभिः। आ। अ॒गा॒त्। पत॑न्ति। मिहः॑। स्त॒नय॑न्ति। अ॒भ्रा ॥

पदार्थ : हे विद्वन् ! आप जैसे (सुपर्णाः) किरणें (आमिनन्त) सब ओर से वर्षा की प्रेरणा करती हैं (एवैः) प्राप्त करनेवाले गुणों से सहित (कृष्णः) आकर्षण करता (वृषभः) वर्षानेवाला सूर्य (इदम्) जल को वर्षाता है, वैसे विद्या की (नोनाव) प्रशंसित वृष्टि करें तथा (स्मयमानाभिः) सदा प्रसन्नवदन (शिवाभिः) शुभ गुण, कर्म्मयुक्त कन्याओं के साथ तत्तुल्य ब्रह्मचारियों के विवाह के (न) समान सुख को (यदि) जो (अगात्) प्राप्त हो और जैसे (अभ्रा) मेघ (स्तनयन्ति) गर्जते तथा (मिहः) वर्षा के जल (आ पतन्ति) वर्षते हैं, वैसे विद्या को वर्षावे तो (ते) तुझको क्या अप्राप्त हो, अर्थात् सब सुख प्राप्त हों ॥ २ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार और उपमालङ्कार हैं। जिन विद्वान् ब्रह्मचारियों की विदुषी ब्रह्मचारिणी स्त्री हों, वे पूर्ण सुख को क्यों न प्राप्त हों ॥ २ ॥