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Rigveda / 1 / 79 / 3

यदी॑मृ॒तस्य॒ पय॑सा॒ पिया॑नो॒ नय॑न्नृ॒तस्य॑ प॒थिभी॒ रजि॑ष्ठैः। अ॒र्य॒मा मि॒त्रो वरु॑णः॒ परि॑ज्मा॒ त्वचं॑ पृञ्च॒न्त्युप॑रस्य॒ योनौ॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 79 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर वह कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदपाठ : यत् ई॒म्। ऋ॒तस्य॑। पय॑सा। पिया॑नः। नय॑न्। ऋ॒तस्य॑। प॒थिऽभिः॑। रजि॑ष्ठैः। अ॒र्य॒मा। मि॒त्रः। वरु॑णः। परि॑ऽज्मा। त्वच॑म्। पृ॒ञ्च॒न्ति॒। उप॑रस्य। योनौ॑ ॥

पदार्थ : (यत्) जब (ऋतस्य) उदक के (पयसा) रस को (पियानः) पीनेवाला (रजिष्ठैः) अत्यन्त धूलीयुक्त (पथिभिः) मार्गों से (उपरस्य) मेघ के (योनौ) कारणरूप मण्डल में (ईम्) जल को (नयन्) प्राप्त करता हुआ (अर्यमा) नियन्ता (सूर्यः) (मित्रः) प्राण (वरुणः) उदान और (परिज्मा) सब ओर से जाने-आनेवाला जीव (ऋतस्य) सत्य के (त्वचम्) त्वचा रूप उपरिभाग को (पृञ्चन्ति) सम्बन्ध करते हैं, तब सब का जीवन सम्भव होता है ॥ ३ ॥

भावार्थ : जब कार्य्य और कारण में रहनेवाले प्राण और जलादि पदार्थों के साथ जीव सम्बन्ध को प्राप्त होते हैं, तब शरीरों के धारण करने को समर्थ होते हैं ॥ ३ ॥