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Samveda/5

प्रेष्ठं वो अतिथि स्तुषे मित्रमिव प्रियम्। अग्ने रथं न वेद्यम्॥५

Veda : Samveda | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : उशना काव्यः | देवता : अग्निः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : उस परमात्मा की मैं स्तुति करता हूँ, यह कहते हैं।

पदपाठ : प्रेष्ठम्। वः । अतिथिम् । स्तुषे । मित्रम् । मि । त्रम् । इव। प्रियम् । अग्ने । रथम् । न । वेद्यम् । ५।

पदार्थ : हे (अग्ने) अग्रणी परमात्मन् ! (प्रेष्ठम्) सबसे अधिक प्रिय (अतिथिम्) अतिथिरूप, (मित्रम् इव) मित्र के समान (प्रियम्) प्रिय, (रथं न) रथ के समान, (वेद्यम्) प्राप्तव्य (वः) आपकी, मैं (स्तुषे) स्तुति करता हूँ ॥५॥यहाँ 'मित्र के समान प्रिय' और 'रथ के समान प्राप्तव्य' में उपमालङ्कार है। अग्नि में अतिथित्व के आरोप में रूपक है ॥५॥

भावार्थ : मित्र जैसे सबको प्रिय होता है, वैसे परमात्मा उपासकों को प्रिय है। रथ जैसे गन्तव्य स्थान पर पहुँचने के लिए प्राप्तव्य होता है, वैसे ही परमात्मा प्रेय-मार्ग और श्रेय-मार्ग के लक्ष्यभूत ऐहिक और पारलौकिक उत्कर्ष को पाने के लिए सबसे प्राप्त करने योग्य तथा स्तुति करने योग्य है। हृदयप्रदेश में विद्यमान परमात्मा साक्षात् घर में आया हुआ सबसे अधिक प्रिय अतिथि ही है, अतः वह अतिथि के समान सत्कार करने योग्य है ॥५॥