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Samveda/89

अगन्म वृत्रहन्तमं ज्येष्ठमग्निमानवम् । य स्म श्रुतर्वन्नार्क्ष्ये बृहदनीक इध्यते॥८९

Veda : Samveda | Mantra No : 89

In Hindi:

ऋषि : गोपवन आत्रेयः | देवता : अग्निः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : अगले मन्त्र में परमात्मा के गुणों का वर्णन है।

पदपाठ : अगन्म। वृत्रहन्तमम्।वृत्र।हन्तमम्। ज्येष्ठम्। अग्निं। आनवम् । यः। स्म।श्रुतर्वन्। आर्क्षे। बृहदनीकः ।बृहत्। अनीकः। इध्यते।९।

पदार्थ : हम (वृत्रहन्तमम्) पापों के अतिशय विनाशक, (ज्येष्ठम्) सर्वाधिक प्रशंसनीय और महान् (आनवम्) मनुष्यों के हितकारी (अग्निम्) तेजस्वी परमेश्वर को (अगन्म) प्राप्त हुए हैं। (यः स्म) जो (श्रुतर्वन्) प्रसिद्ध किरणरूप अश्वोंवाले ज्योतिर्मय सूर्य में तथा (आर्क्षे) तारापुंज में (बृहदनीकः) विशाल तेजवाला होकर (इध्यते) भासमान होता है ॥९॥

भावार्थ : प्रचण्ड दीप्तिवाले सूर्य में, तारामण्डल में, सारे ही ब्रह्माण्ड में जिसका कर्तृत्व, जिसकी दी हुई शक्ति, जिसका उत्पन्न किया तेज द्योतमान है, जो पापों का संहारक, मनुष्यों का हितकर्ता, सर्वाधिक प्रशंसनीय पुराण-पुरुष है, उसकी सबको वन्दना, प्राप्ति और उपासना करनी चाहिए ॥९॥इस मन्त्र पर कुछ लोगों की यह व्याख्या असंगत है कि श्रुतर्वा नाम का कोई राजा था, जो ऋक्ष का पुत्र था, जिसके पास अग्नि प्रदीप्त रहती थी, क्योंकि वेदों में लौकिक इतिहास नहीं है ॥९॥