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Samveda/90

जातः परेण धर्मणा यत्सवृद्धिः सहाभुवः । पिता यत्कश्यपस्याग्निः श्रद्धा माता मनुः कविः॥९०

Veda : Samveda | Mantra No : 90

In Hindi:

ऋषि : वामदेवः कश्यपो वा मारीचो मनुर्वा वैवस्वत अभौ वा | देवता : अग्निः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : अगले मन्त्र में मनुष्य-जन्म ग्रहण किये हुए जीवात्मा को सम्बोधन करके कहा गया है।

पदपाठ : जातः। परेण। धर्मणा। यत्। सवृद्भिः। स।वृद्भिः। सह।अभुवः । पिता। यत्। कश्यपस्या।अग्निः। ।श्रद्धा।श्रत्।धा। माता। मनुः। कविः।१०। आ.४६.अ.१८.प.१७३।गि.दशति।९।

पदार्थ : हे जीवात्मन् ! तू (परेण) उत्कृष्ट (धर्मणा) धर्मनामक संस्कार के कारण (जातः) मानवयोनि में जन्मा है, (यत्) क्योंकि तू (सवृद्भिः सह) साथ रहनेवाले सूक्ष्मशरीरस्थ पाँच प्राण, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच सूक्ष्मभूत और मन तथा बुद्धि, इन सत्रह तत्त्वों के साथ (अभुवः) विद्यमान था। (यत्) क्योंकि (कश्यपस्य) तुझ द्रष्टा का (पिता) पिता अर्थात् मनुष्यशरीरदाता (अग्निः) अग्रणी तेजोमय परमात्मा है, अतः (श्रद्धा) श्रद्धा (माता) तेरी माता के तुल्य हो और तू (स्वयम् मनुः) मननशील, तथा (कविः) मेधावी बन ॥१०॥

भावार्थ : जब जीवात्मा मृत्यु के समय शरीर से निकलता है, तब सूक्ष्म शरीर उसके साथ विद्यमान होता है, और सूक्ष्मशरीरस्थ चित्त में धर्माधर्म नामक शुभाशुभ कर्म-संस्कार आत्मा के साथ जाते हैं। धर्म से वह मनुष्य-जन्म और अधर्म से पशु-पक्षी आदि का जन्म पाता है। जीवात्मा ज्ञानग्रहण के सामर्थ्यवाला होने से कश्यप अर्थात् द्रष्टा है। इसलिए उसे सकल ज्ञान-विज्ञान का संचय करना चाहिए। क्योंकि परमेश्वर उसका शरीर में जन्म-दाता होता है, अतः पिता की महत्ता का विचार करके उसे जीवन में श्रद्धा को माता के समान स्वीकार करना चाहिए और स्वयं मननशील तथा मेधावी बनना चाहिए ॥१०॥जो लोग यह कहते हैं कि कश्यप ऋषि का नाम है, श्रद्धा देवी का नाम है और मनु से वैवस्वत मनु का ग्रहण है, उनका मत वेदों में लौकिक इतिहास न होने से संगत नहीं है ॥इस दशति में परमात्मा से यश, तेज, धन, बल आदि की प्रार्थना, परमात्मा के प्रभाव का वर्णन, अतिथि परमात्मा के प्रति हव्य-समर्पण और उसके पूजन की प्रेरणा होने से तथा परमात्मा को पिता और श्रद्धा को माता के रूप में वर्णित करने से इसके विषय की पूर्वदशति के विषय के साथ संगति है, ऐसा जानो।प्रथम प्रपाठक में द्वितीय अर्ध की चतुर्थ दशति समाप्त।प्रथम अध्याय में नवम खण्ड समाप्त ॥