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Samveda/286

यः सत्राहा विचर्षणिरिन्द्रं त हूमहे वयम्। सहस्रमन्यो तुविनृम्ण सत्पते भवा समत्सु नो वृधे॥२८६

Veda : Samveda | Mantra No : 286

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजः बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्रः | छन्द : बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : अगले मन्त्र में यह कहा गया है कि कैसे परमेश्वर और राजा को हम पुकारें और उससे क्या याचना करें।

पदपाठ : यः। सत्राहा। सत्रा।हा। विचर्षणिः ।वि।चर्षणिः। इन्द्रम् । तम्। हूमहे। वयम्। सहस्रमन्यो।सहस्र।मन्यो ।तुविनृम्ण । तुवि।नृम्ण ।सत्पते।सत्।पते। भव। समत्सु ।स।मत्सु। नः। वृधे। ४।

पदार्थ : (यः) जो परमात्मा वा राजा (सत्राहा) सत्य से असत्य का हनन करनेवाला अथवा सत्य व्यवहार करनेवाला और (विचर्षणिः) विशेष रूप से द्रष्टा है, (तम्) उस (इन्द्रम्) दुःख, विघ्न आदि के विदारक तथा सुख एवं ऐश्वर्य के प्रदाता परमात्मा और राजा को (वयम्) हम प्रजाजन (हूमहे) पुकारते हैं। हे (सहस्रमन्यो) पापों और पापियों के विनाशार्थ अनन्त उत्साह को धारण करनेवाले, (तुविनृम्ण) बहुत बली तथा बहुत धनी, (सत्पते) सज्जनों के पालक ! तू (समत्सु) जीवन के संघषों में एवं देवासुरसंग्रामों में (नः) हमारी (वृधे) वृद्धि के लिए (भव) हो ॥४॥इस मन्त्र में अर्थश्लेष अलङ्कार है ॥४॥

भावार्थ : जैसे ब्रह्माण्ड में परमेश्वर सत्य का हन्ता, सर्वद्रष्टा, पापों को सहन न करनेवाला, बहुत बलवान्, बहुत धनवान् और देवासुरसंग्रामों में देवपुरुषों को विजय दिलानेवाला तथा बढ़ानेवाला है, वैसे ही राष्ट्र में राजा हो ॥४॥