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Samveda/287

शचीभिर्नः शचीवसू दिवानक्तं दिशस्यतम्। मा वा रातिरुप दसत्कदाचनास्मद्रातिः कदाचन॥२८७

Veda : Samveda | Mantra No : 287

In Hindi:

ऋषि : परुच्छेपो दैवोदासिः | देवता : इन्द्रः | छन्द : बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : अगले मन्त्र में अश्वियुगल देवता हैं। उनसे याचना की गयी है।

पदपाठ : शचीभिः। नः। शचीवसू।शची। वसूइति। दिवा । नक्तं। दिशस्यतम्। मा। वाम्। रातिः।उप। दसत्। कदा।च।न।अस्मत्। रातिः। कदा।च।न।५।

पदार्थ : हे (शचीवसू) कर्म-रूप धनवाले परमात्मा-जीवात्मा, गुरु शिष्य, अध्यापक-उपदेशक, वैद्य-शल्यचिकित्सक, राजा-राजमन्त्री, सभापति-सेनापति आदि अश्वीदेवो ! तुम (शचीभिः) अपने-अपने कर्मों से (नः) हमें (दिवा नक्तम्) दिन-रात (दिशस्यतम्) अपनी-अपनी देनें प्रदान करो। (वाम्) तुम्हारा (रातिः) दान (कदा च न) कभी (मा उपदसत्) समाप्त न हो, वैसे ही (अस्मत्) हमारे अन्दर से (रातिः) दान का गुण (कदा च न) कभी (मा उपदसत्) समाप्त न हो, अर्थात् हम भी निरन्तर दान में संलग्न रहें ॥५॥इस मन्त्र में ‘शची, शची’, ‘राति, रातिः’, तथा ‘कदा च न, कदा च न’ में लाटानुप्रास अलङ्कार है ॥५॥

भावार्थ : उक्त अश्वी-युगल जैसे अपनी-अपनी आध्यात्मिक, वैयक्तिक, सामाजिक, राष्ट्रिय, शिल्पात्मक, चिकित्सात्मक आदि देनों से हमारा उपकार करते रहें, उसी प्रकार हम भी अपनी-अपनी योग्यता के अनुसार दूसरों का उपकार करें ॥५॥