Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/288

यदा कदाच मीढुषे स्तोता जरेत मर्त्यः। आदिद्वन्देत वरुणं विपा गिरा धर्त्तारं विव्रतानाम्॥२८८

Veda : Samveda | Mantra No : 288

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्रः | छन्द : बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : अगले मन्त्र में वरुण देवता है। उसकी उपासना के लिए प्रेरणा की गयी है।

पदपाठ : यदा। कदा।च। मीढुषे। स्तोता । जरेत । मर्त्यः। आत्। इत्। वन्देत। वरुणम्। विपा। गिरा। धर्त्तारम् । विव्रतानाम्।वि।व्रतानाम्।६।

पदार्थ : (यदा कदा च) जब कभी (स्तोता) स्तोता (मर्त्यः) मनुष्य (मीढुषे) बादल के समान ऐश्वर्यवर्षक परमैश्वर्यशाली इन्द्र परमात्मा को अनुकूल करने के लिए (जरेत) उसकी अर्चना करे, (आत् इत्) उसके अनन्तर ही वह (विव्रतानाम्) व्रत-रहितों को (धर्तारम्) कर्म-पाशों से जकड़नेवाले, (वरुणम्) कर्मानुसार फल देकर पापों से निवारण करनेवाले वरुण परमात्मा की भी (विपा) मेधायुक्त (गिरा) वाणी से (वन्देत) वन्दना कर लिया करे ॥६॥

भावार्थ : इन्द्र और वरुण दोनों ही परमेश्वर के नाम हैं। इन्द्र नाम से उसकी परमैश्वर्यवत्ता तथा ऐश्वर्यवर्षकता सूचित होती है और वरुण नाम से उसका पाशधारी होना तथा कर्म-पाशों से बाँधकर और दण्ड देकर पापनिवारक होना सूचित होता है। परमेश्वर के इन दोनों ही स्वरूपों के चिन्तन करने, स्मरण करने तथा सदा अपने सामने धारण रखने से मनुष्य अपने जीवन में सन्मार्गगामी होकर सफलता प्राप्त कर सकता है। ऐश्वर्य पाकर मनुष्य कुमार्ग में प्रवृत्त न हो जाए, इसके लिए परमेश्वर के वरुण स्वरूप को भी ध्यान में रखना आवश्यक है ॥६॥