Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/458

अय सहस्रमानवो दृशः कवीनां मतिउज्योतिर्विधर्म। ब्रध्नः समीचीरुषसः समैरयदरेपसः स चेतसः स्वसरे मन्युमन्तश्चिता गोः॥४५८

Veda : Samveda | Mantra No : 458

In Hindi:

ऋषि : गौरांगिरसः | देवता : सूर्यः | छन्द : अति जगती | स्वर : निषादः

विषय : अगले मन्त्र का देवता सूर्य है। आदित्य, परमेश्वर और आचार्य का वर्णन है।

पदपाठ : अयम्। सहस्रम्। आनवः। दृशः। कवीनाम्। मतिः। ज्योतिः। विधर्म।वि।धर्म। ब्रध्नः। समीचीः।सम्।ईचीः। उषसः। सं। ऐरयत्। अरेपसः।अ।रेपसः। सचेतसः।स।चेतसः। स्वसरे। मन्युमन्तः। चिताः। गोः ।२।

पदार्थ : (अयम्) यह सूर्य, परमेश्वर वा आचार्य (सहस्रम्) अकेला भी सहस्र के तुल्य, (आनवः) मनुष्यों के लिए हितकर, (दृशः) द्रष्टा अथवा दर्शन करानेवाला, (कवीनाम्) मेधावी विद्वानों का (मतिः) मतिप्रदाता, और (विधर्म ज्योतिः) विशेष धारक प्रकाश से युक्त है। (ब्रध्नः) महान् यह सूर्य, परमेश्वर वा आचार्य (समीचीः) सम्यक् गतिवाली, (अरेपसः) निर्मल (उषसः) उषाओं को अथवा ज्ञानदीप्तियों को (समैरयत्) भली-भाँति प्रेरित करता है, जिससे (स्वसरे) उज्ज्वल दिन अथवा दिन के समान उज्ज्वल विवेक के प्रकट हो जाने पर (सचेतसः) सहृदय जन (मन्युमन्तः) तेजयुक्त अथवा ब्रह्मवर्चस्वी होकर (गोः) किरणसमूह के अथवा वेदवाणी के (चिताः) ज्ञाता हो जाते हैं ॥२॥इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मतिः और ज्योतिः के अर्थ लक्षणा द्वारा क्रमशः मतिप्रदाता और ज्योतिष्मान् होते हैं। ‘तिर्, तिर्’, ‘समी, समै’ और ‘चेत, चिता’ में छेकानुप्रास तथा सकार, रेफ व तकार की पृथक्-पृथक् अनेक बार आवृत्ति में वृत्त्यनुप्रास अलङ्कार है ॥२॥

भावार्थ : जैसे सूर्य प्रकाशवती उषाओं को प्रेरित करता है, वैसे ही परमात्मा और आचार्य मनुष्यों में विद्या एवं विवेक की कान्तियों को उत्पन्न करते हैं ॥२॥