Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/547

सुतासो मधुमत्तमाः सोमा इन्द्राय मन्दिनः। पवित्रवन्तो अक्षरन् देवान् गच्छन्तु वो मदाः॥५४७

Veda : Samveda | Mantra No : 547

In Hindi:

ऋषि : यथात्रिर्नाहुषः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : अगले मन्त्र में परमानन्दरूप सोमरस का विषय है।

पदपाठ : सुतासः। मधुमत्तमाः। सोमाः। इन्द्राय। मन्दिनः। पवित्रवन्तः। अक्षरन्। देवान् । गच्छन्तु। वः। मदाः। ३।

पदार्थ : (मधुमत्तमाः) सबसे अधिक मधुर, (मन्दिनः) हर्षजनक (सोमाः) परमानन्द-रस (इन्द्राय) जीवात्मा के लिए (सुतासः) अभिषुत किये हुए, (पवित्रवन्तः) मन रूप दशापवित्र से युक्त होकर (अक्षरन्) आत्मा रूप कलश में क्षरित होते हैं। वे (मदाः) परमानन्दरस (वः) आप (देवान्) सब विद्वान् जनों को (गच्छन्तु) प्राप्त होवें ॥३॥

भावार्थ : ध्यान द्वारा परमात्मा के पास से प्रादुर्भूत अत्यन्त मधुर परमानन्दरस मन के माध्यम से जीवात्मा को प्राप्त होते हैं ॥३॥